उम्र की सीढ़ियाँ

कुछ सपने थे आँखों में,
कुछ ज़िम्मेदारियाँ भी थीं,
चलते-चलते उम्र गुज़री,
सोचा था अभी तो जहान था।

कल की बातें आज हुईं,
आज भी जैसे कल ही लगा,
कैसे बीत गया ये जीवन,
हमें तो पता ही न लगा।

कंधों पर जब बस्ता था,
तब दुनिया कितनी छोटी थी,
माँ की डाँट में ममता थी,
पिता की खामोशी भी मोती थी।

फिर रोज़ी-रोटी की राहों ने,
पैरों को इतना थाम लिया,
अपनों की ख़ातिर जीते-जीते,
खुद को कभी न आराम दिया।

हर मौसम घर पर न्योछावर
अपने हिस्से की धूप-छाँव,
लेकिन अपने मन के आँगन में,
न मिली फुरसत, न मिली ठाँव।

कुछ सपने थे आँखों में,
कुछ ज़िम्मेदारियाँ भी थीं,
चलते-चलते उम्र गुज़री,
सोचा था अभी तो जहान था।

बच्चों की उँगली थामे थे,
फिर वे भी आगे बढ़ते गये,
हम जिन राहों के राही थे,
उन राहों से हम हटते गये।

कल जिनको गोदी में खिलाया,
वे जीवन का आधार बने,
और एक दिन उनकी खुशियों से,
हमारे सपने साकार बने।

दर्पण बोला — “धीरे चलना”,
दिल बोला — “अभी जवान है”,
इन दोनों की खींचातानी में,
आज भी थोड़ा हैरान है।

कुछ यार पुराने छूट गये,
कुछ रिश्ते वक़्त में खोये हैं,
कुछ तस्वीरों में बसते हैं,
कुछ यादों में ही सोये हैं।

अब पीछे मुड़कर देखें तो,
कोई शिकवा नहीं ज़माने से,
जो पाया वो अनमोल मिला,
जो खोया, सीख मिली उससे।

जीवन कोई मंज़िल नहीं,
बस चलता रहता कारवाँ,
कल बच्चे थे, आज बुज़ुर्ग हैं,
यही समय का है फ़रमान।

अगर अभी भी साँसों में
अपनों का प्यार बचा हुआ,
अगर किसी की आँखों में
अपना इंतज़ार बचा हुआ,

तो समझो जीवन हार नहीं,
यह सफ़र अभी भी ख़ास है,
उम्र नहीं गिनी जाती सालों से,
दिल धड़के तो हर पल पास है।

चलो हँसकर ये दिन जी लें,
कल का किसने हाल लिखा,
पूरी उम्र कैसे बीत गई…
वो सिर्फ़ हमें ही है पता।

✍🏻 आरती परीख १४.६.२०२६

प्रकृति का धैर्य

तेज हवाएं
उडा ले गई
अनगिनत पत्तें
फिर भी
हमने
पेडपौधों को
हवाओं संग
गुनगुनाते
देखा है…
सुना है…!
✍🏻 आरती परीख


छिन जाने पर भी मुस्कुराना,
झुक जाने पर भी टूट न जाना,
और हर तूफ़ान के बीच
जीवन का गीत गाते रहना।

क्षितिज की ओर

छवि विचार : ”क्षितिज की ओर

रस्सियों में उलझे हुए कितने ही प्रसंग हैं,
पर मेरी नज़र अब भी क्षितिज पर टिकी है।

वक़्त ने गाँठें बहुत दीं,
कुछ रिश्तों में, कुछ सपनों में,
पर मैंने हर उलझन को
सफ़र का हिस्सा मान लिया है।

डूबता सूरज सिखा गया—
हर विदाई अंत नहीं होती,
कुछ शामें
नई सुबहों का पता लिखकर जाती हैं।

मैं ठहरी नहीं हूँ,
बस पल भर को
इस सुनहरी ख़ामोशी का हाथ थामे खड़ी हूँ,
ताकि फिर से
अपने भीतर के समंदर में उतर सकूँ।

✍🏻 आरती परीख ११.६.२०२६

यात्रा : व्यक्ति के चरित्र का दर्पण

“यदि किसी व्यक्ति का चरित्र जानना हो, तो उसके साथ एक यात्रा कीजिए; यदि अपना चरित्र जानना हो, तो अकेले यात्रा कीजिए।”

यह कथन केवल एक सुंदर विचार नहीं, बल्कि जीवन का एक गहरा सत्य है। हम अक्सर लोगों को उनके पद, प्रतिष्ठा, वेशभूषा और उपलब्धियों के आधार पर पहचानने का प्रयास करते हैं। किंतु मनुष्य का वास्तविक परिचय उसके शब्दों में नहीं, उसके व्यवहार में छिपा होता है। और उस व्यवहार की सबसे सच्ची परीक्षा यात्रा के दौरान होती है।

यात्रा केवल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचने का माध्यम नहीं है; यह मनुष्य की सहनशीलता, संवेदनशीलता, विनम्रता, अनुशासन और दृष्टिकोण की परीक्षा भी है। घर और कार्यालय के परिचित वातावरण में हम अपने व्यवहार को नियंत्रित कर सकते हैं, परंतु यात्रा के दौरान मिलने वाली अनिश्चितताएँ व्यक्ति के स्वभाव की परतें खोल देती हैं।

जब ट्रेन देर से आती है, उड़ान रद्द हो जाती है, होटल अपेक्षा के अनुरूप नहीं मिलता, या रास्ता भटक जाता है, तब व्यक्ति की प्रतिक्रिया उसके चरित्र का परिचय देती है। कोई छोटी-सी असुविधा पर क्रोधित हो उठता है, तो कोई उसी परिस्थिति में धैर्य और संतुलन बनाए रखता है। यही अंतर चरित्र और व्यक्तित्व के बीच की रेखा खींचता है।

यात्रा यह नहीं दिखाती कि व्यक्ति के पास क्या है;

वह यह दिखाती है कि व्यक्ति वास्तव में क्या है।

किसी के पद, उपाधियाँ, पुरस्कार और संपत्ति घर की दीवारों पर टंगे रह जाते हैं; यात्रा में उसके साथ चलते हैं केवल उसके संस्कार, उसका व्यवहार और उसकी मानवता। यही कारण है कि किसी व्यक्ति को समझने के लिए उसके साथ कुछ दिन यात्रा कर लेना, कई वर्षों की औपचारिक पहचान से अधिक प्रभावी हो सकता है।

यात्रा मनुष्य के भीतर छिपी हुई संवेदनाओं को भी उजागर करती है। कोई अपने सामान की चिंता में डूबा रहता है, तो कोई वृद्ध सहयात्री का बैग उठाने में संकोच नहीं करता। कोई अपनी सुविधा को सर्वोपरि मानता है, तो कोई दूसरों के लिए स्थान बनाना जानता है। इन छोटे-छोटे व्यवहारों में ही मनुष्य की वास्तविक संस्कृति और संस्कार दिखाई देते हैं।

किसी वृद्ध यात्री को सीट देना, किसी अनजान व्यक्ति की सहायता करना, सेवा करने वाले कर्मचारियों के प्रति सम्मान रखना, स्थानीय संस्कृति और परंपराओं का आदर करना—ये छोटे-छोटे कार्य व्यक्ति के भीतर बसे मूल्यों का परिचय देते हैं। चरित्र का निर्माण बड़े अवसरों से कम और ऐसे ही छोटे क्षणों से अधिक होता है।

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यात्रा अहंकार को चुनौती देती है। जब हम किसी नए प्रदेश, नई भाषा, नई संस्कृति या नए वातावरण में पहुँचते हैं, तब हमें एहसास होता है कि हमारा ज्ञान और अनुभव संपूर्ण नहीं है। हमें सीखना पड़ता है, पूछना पड़ता है और स्वीकार करना पड़ता है कि दुनिया हमारी सीमाओं से कहीं अधिक विशाल है। यह अनुभव व्यक्ति को विनम्र बनाता है।

जो यात्रा से केवल तस्वीरें लेकर लौटता है, वह दृश्य देखता है; लेकिन जो यात्रा से सीख लेकर लौटता है, वह जीवन देखता है।

जो यात्रा से सीखने का भाव लेकर लौटता है, उसका दृष्टिकोण अधिक व्यापक, उदार और मानवीय हो जाता है। वह विविधताओं में विभाजन नहीं, सौंदर्य देखने लगता है। उसे समझ में आता है कि संसार को केवल अपनी दृष्टि से नहीं, दूसरों की दृष्टि से भी देखा जा सकता है।

वास्तव में यात्रा बाहरी संसार जितना ही आंतरिक संसार का भी परिचय कराती है। लंबी सड़कें, पहाड़ों की नीरवता, समुद्र की अथाह लहरें, रेल की खिड़की से पीछे छूटते दृश्य—ये सब मनुष्य को स्वयं से संवाद करने का अवसर देते हैं। जीवन की भागदौड़ में जो प्रश्न अनुत्तरित रह जाते हैं, वे अक्सर यात्रा की शांति में उत्तर खोज लेते हैं।

कई बार यात्रा हमें उन सत्यों से मिलवाती है, जिनसे हम वर्षों से बचते रहे होते हैं। यह हमें हमारी सीमाएँ दिखाती है, हमारी क्षमताएँ भी। यह बताती है कि हम कितने धैर्यवान हैं, कितने उदार हैं, और कितने तैयार हैं बदलने और सीखने के लिए।

शायद इसलिए कुछ लोग दुनिया देखकर लौटते हैं, और कुछ लोग दुनिया को देखकर स्वयं को पहचान लेते हैं।

इतिहास साक्षी है कि अनेक महापुरुषों के व्यक्तित्व का निर्माण उनकी यात्राओं ने किया। तीर्थयात्राएँ, अध्ययन यात्राएँ, देशाटन और अन्वेषण—इन सबने केवल उनके ज्ञान का विस्तार नहीं किया, बल्कि उनके चरित्र को भी परिपक्व बनाया। अनुभवों ने दृष्टि दी और दृष्टि ने व्यक्तित्व को गहराई प्रदान की।

आज यात्रा पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सरल और सुविधाजनक हो गई है। आधुनिक साधनों ने दूरियों को छोटा कर दिया है, पर यात्रा का वास्तविक महत्व आज भी वही है। वह हमें हमारी सीमाओं से बाहर निकालती है, विविधताओं से परिचित कराती है और मनुष्य होने का अर्थ समझाती है।

अंततः कहा जा सकता है कि यात्रा व्यक्ति के चरित्र का सबसे सच्चा दर्पण है। यह केवल यह नहीं बताती कि कोई व्यक्ति कहाँ-कहाँ गया, बल्कि यह भी बताती है कि वह रास्तों पर चलते हुए कैसा इंसान बना।

मंज़िलें हमें स्थान देती हैं,
यात्राएँ हमें पहचान देती हैं।

यात्रा में तय की गई दूरियाँ समय के साथ भुलाई जा सकती हैं, देखे गए दृश्य स्मृतियों में धुंधले पड़ सकते हैं, पर यात्रा के दौरान प्रकट हुआ चरित्र जीवन भर याद रहता है।

क्योंकि
रास्ते केवल मंज़िल तक नहीं पहुँचाते,
वे मनुष्य को स्वयं से मिलवाते हैं।

और शायद
यही यात्रा की सबसे बड़ी उपलब्धि है—
वह हमें दुनिया से पहले
स्वयं का परिचय कराती है।

यात्रा केवल संसार नहीं दिखाती,
वह मनुष्य को
उसका अपना स्वरूप भी दिखाती है।

यही कारण है कि
यात्रा एक मार्ग भर नहीं,
चरित्र-निर्माण की एक सतत साधना है;
ऐसी साधना,
जो हर नए रास्ते के साथ
मनुष्य को
थोड़ा और विनम्र,
थोड़ा और व्यापक,
और थोड़ा अधिक मानवीय बनाती जाती है।

अंततः यात्रा का वास्तविक उद्देश्य
किसी स्थान तक पहुँचना नहीं,
बल्कि
एक बेहतर मनुष्य बनकर लौटना है।

क्योंकि जीवन की सबसे सफल यात्राएँ
वे नहीं होतीं
जो हमें दुनिया के नए कोने दिखा दें;

वे होती हैं
जो हमारे भीतर छिपे
नए आयामों से परिचित करा दें।

जब यात्रा समाप्त होती है,
तब केवल रास्ता पीछे नहीं छूटता,
एक पुराना ‘मैं’ भी पीछे रह जाता है।

और एक नया ‘मैं’—
कुछ अधिक समझदार,
कुछ अधिक विनम्र,
कुछ अधिक मानवीय होकर
हमारे साथ लौटता है।

शायद यही किसी भी यात्रा की
सबसे सुंदर उपलब्धि है।

✍🏻 आरती परीख ११.६.२०२६

सबसे अमीर

गाँव के स्कूल में नए-नए मास्टरजी आए थे। पहले ही दिन उन्होंने बच्चों से एक अजीब-सा सवाल पूछ लिया—
“बताओ, तुममें सबसे अमीर कौन है?”

कक्षा में हलचल मच गई।

एक लड़का तुरंत खड़ा हो गया—
“मास्टरजी, जिसके पापा के पास ट्रैक्टर है।”

दूसरा बोला—
“नहीं, जिसके घर सबसे बड़ी टीवी है।”

तीसरा बोला—
“जिसके पास सबसे ज़्यादा पैसे हैं, वही सबसे अमीर है।”

मास्टरजी मुस्कुराए। उन्होंने न किसी को सही कहा, न ग़लत। बस चुपचाप पूरी कक्षा को देखते रहे।

उस दिन शाम को स्कूल की छुट्टी के बाद वे गाँव की गलियों से होकर घर लौट रहे थे। तभी उनकी नज़र मैदान पर पड़ी।

कुछ बच्चे गिल्ली-डंडा खेल रहे थे।

कुछ कंचों की बाज़ी में इतने मग्न थे मानो किसी राज्य का भविष्य तय हो रहा हो।

एक कोने में लट्टू नाच रहा था और उसके चारों ओर खड़े बच्चे तालियाँ बजा रहे थे।

कुछ बच्चे पुराने साइकिल के टायर को डंडे से दौड़ाते हुए ऐसे भाग रहे थे जैसे ओलंपिक की दौड़ जीतने निकले हों।

उनके पैरों में महँगे जूते नहीं थे। किसी की कमीज़ पर पैबंद था। किसी का बटन टूटा हुआ था। लेकिन उनके चेहरों पर जो चमक थी, वह किसी हीरे से कम नहीं थी।

मास्टरजी देर तक उन्हें देखते रहे। उस दिन उन्हें अपने सवाल का जवाब मिल गया।

अगली सुबह वे कक्षा में पहुँचे। बच्चे अभी भी उत्सुक थे। सबसे पहले एक बच्चे ने पूछा—
“मास्टरजी, आपने बताया नहीं… सबसे अमीर कौन है?”

मास्टरजी मुस्कुराए। फिर बोले—
“कल मैंने सबसे अमीर बच्चों को देख लिया।”

सारी कक्षा एक साथ बोल उठी—
“कौन?”

मास्टरजी ने धीरे से कहा—
“वह बच्चा जिसके पास खेलने के लिए दोस्त हैं।
वह जो हारकर भी हँस सकता है।
वह जो जीतकर अकेला नहीं इतराता, बल्कि सबको साथ लेकर खुश होता है।
और वह…
जो शाम को घर लौटते समय थका हुआ होता है, मगर उदास नहीं।”

पूरी कक्षा शांत हो गई।

मास्टरजी आगे बोले—
“बेटा, पैसा बहुत ज़रूरी है।
लेकिन एक उम्र के बाद लोग पैसों से बहुत कुछ खरीद लेते हैं।
खिलौने खरीद लेते हैं…
पर खेलने का समय नहीं।
घर खरीद लेते हैं…
पर पड़ोसी नहीं।
मोबाइल खरीद लेते हैं…
पर दिल से बातें करने वाले दोस्त नहीं।
और कभी-कभी…
पूरा संसार खरीद लेते हैं,
पर बचपन जैसी एक शाम नहीं खरीद पाते।”

उस दिन बच्चों को शायद बात पूरी तरह समझ नहीं आई। लेकिन मास्टरजी के शब्द उनके मन में कहीं उतर गए।

समय बीतता गया। बच्चे बड़े हो गए।
कोई इंजीनियर बन गया।
कोई व्यापारी।
कोई शहर चला गया।
कोई विदेश।
जिन गलियों में कभी उनकी आवाज़ गूँजती थी, वहाँ अब नई पीढ़ी खेलती थी।

कई वर्षों बाद गाँव में एक मिलन समारोह रखा गया। पुराने मित्र फिर एक साथ बैठे।
सब सफल थे।
किसी के पास बड़ी गाड़ी थी।
किसी का बड़ा कारोबार।
किसी के नाम के आगे बड़े-बड़े पद लिखे थे।

लेकिन उस शाम एक अजीब बात हुई।

किसी ने अपनी कार की चर्चा नहीं की।
किसी ने बैंक बैलेंस का ज़िक्र नहीं किया।
किसी ने अपने पद का परिचय नहीं दिया।

बात शुरू हुई तो अचानक किसी ने पूछा—
“याद है वो लट्टू?”

दूसरा हँस पड़ा—
“और वो कंचों की बाज़ी?”

तीसरा बोला—
“अरे, टायर की रेस में तो मैं हमेशा अव्वल आता था!”

और फिर सबकी हँसी एक साथ गूँज उठी।
वही पुरानी।
वही निश्छल।
वही बचपन वाली।

तभी किसी ने मास्टरजी को याद किया।
वे अक्सर बच्चों के माता-पिता से कहा करते थे—

बच्चों को हर सुख देना,
पर इतना ध्यान रखना
कहीं उन्हें सुविधाएँ देतेदेते,
उनका बचपन मत छीन लेना।

यह सुनते ही सब चुप हो गए।
किसी की आँखों में चमक थी।
किसी की पलकों पर नमी।

उन्हें अचानक एहसास हुआ कि जीवन की सबसे बड़ी कमाई उनकी डिग्रियाँ, पद, मकान या बैंक बैलेंस नहीं थे।

सबसे बड़ी कमाई तो वे शामें थीं,
जब जेबें खाली थीं,
पर दिल भरे हुए थे।
जब एक टायर पूरी दुनिया बन जाता था।
एक कंचा ख़ज़ाना लगता था।
और एक दोस्ती उम्र भर की पूँजी।

तभी एक मित्र मुस्कुराया और बोला—
“शायद मास्टरजी सही कहते थे…”
अमीर वह नहीं जिसके पास सबसे ज़्यादा है,
अमीर वह है जिसके पास मुस्कुराकर याद करने लायक बचपन है।

कुछ क्षणों के लिए सब चुप हो गए।
सामने वही पुराना मैदान था।

न लट्टू घूम रहा था,
न कंचों की बाज़ी लगी थी,
न कोई टायर दौड़ रहा था।
फिर भी जैसे हवा में बच्चों की खिलखिलाहट तैर रही थी।

उनमें से किसी ने कुछ नहीं कहा।
क्योंकि
कुछ एहसास शब्दों से नहीं,
सिर्फ़ महसूस किए जाते हैं।

और उस शाम,
सफल लोगों की उस महफ़िल में,
सब फिर से बच्चे बन गए थे।

✍🏻 आरती परीख १०.६.२०२६

उत्तर से परे

दिमाग़ को समझाओ—
बहुत सवाल न करे,

हर रिश्ते की शाख़ पर
तर्कों की कुल्हाड़ी न धरे,
हर एहसास को
तराज़ू में तौलने की ज़िद न करे।

कुछ संबंध
गणित के सूत्र नहीं होते,
जो हल कर लिए जाएँ;
वे तो बरगद की जड़ों जैसे होते हैं,
जितना गहरे उतरते हैं,
उतना ही कम दिखाई देते हैं।

दिल की दुनिया
दलीलों के सूरज से नहीं,
विश्वास के चाँद से रोशन होती है।
वहाँ भावनाएँ
शब्दों की नाव में नहीं,
मौन की नदी में बहती हैं।

ज़रा-सी ठेस लगे
तो मुस्कानों के परिंदे
दूर आकाश में खो जाते हैं,
और यदि दिल ही बिखर जाए,
तो धड़कनों का कारवाँ
अपनी मंज़िल भूल जाता है।

हर प्रेम का कारण
लिखा नहीं जाता,
कुछ कथाएँ
काग़ज़ पर नहीं,
आत्मा की भीतरी दीवारों पर
धीरे-धीरे उभरती हैं।

दिमाग़ अक्सर
फ़तह के झंडे गाड़ना चाहता है,
हर बहस में जीत का मुकुट पहनना चाहता है;
पर दिल…
वह तो नदी है—
हारकर भी
समंदर को अपना बना लेता है।

दिमाग़ कहता है—
“साबित करो कि प्रेम है।”

दिल मुस्कुराकर कहता है—
“जो सिद्ध करना पड़े,
वह प्रेम कहाँ है?”

इसलिए
दिमाग़ को थोड़ा विराम दो,
उसकी दौड़ती पगडंडियों पर
कुछ देर शांति की ओस गिरने दो।

और दिल को
उस पंछी की तरह उड़ने दो,
जो दिशाओं का हिसाब नहीं रखता,
फिर भी अपने आकाश तक पहुँच जाता है।

क्योंकि जीवन
तर्कों की सूखी किताब में नहीं,
भावनाओं की भीगी पंक्तियों में बसता है।

और प्रेम…
वह कोई उत्तर नहीं,
एक अनंत प्रश्न है,
जिसे समझने से अधिक
महसूस करना पड़ता है।

दिमाग़ को समझाओ—
बहुत सवाल न करे,
कहीं ऐसा न हो कि
उत्तर खोजते-खोजते,
धड़कनों की कविता ही अधूरी रह जाए।

✍🏻 आरती परीख ८.६.२०२६

मौन का हिसाब

माँ को गए हुए पाँच साल हो चुके थे। लेकिन आज भी जब कोई परेशानी आती, तो ज्योति का पहला मन करता कि फ़ोन उठाए और माँ का नंबर मिला दे।

फिर याद आता— उधर अब कोई “हाँ बेटा…” कहने वाला नहीं है।

कभी-कभी वह माँ का नंबर आज भी मोबाइल में खोजती थी। जानती थी कि घंटी कहीं नहीं बजेगी, फिर भी कुछ रिश्ते आदतों से जुड़े रहते हैं। कुछ लोगों के जाने के बाद भी उनका होना हमारे भीतर कहीं बचा रहता है।

विवाह के बाद ज्योति की ज़िंदगी जैसे भागने लगी थी। पति, बच्चे, सास-ससुर, नौकरी, घर… दिन खत्म हो जाता, लेकिन काम नहीं। सुबह की चाय से शुरू हुई दौड़ रात के बर्तनों तक चलती रहती।

इसी भागदौड़ में उसने धीरे-धीरे अपने बड़े भाई को फ़ोन करना भी कम कर दिया। पहले हर हफ़्ते बात होती थी। फिर महीने में एक बार। फिर त्योहारों तक सीमित।

भाई कभी-कभी फ़ोन करते।
“कैसी है?”

“ठीक हूँ भैया, बाद में बात करती हूँ।”
और फ़ोन कट जाता। हर बार सचमुच कोई काम होता था। कभी गैस पर दूध चढ़ा होता, कभी बच्चे को होमवर्क कराना होता, कभी ऑफिस की मीटिंग।

वजहें हमेशा मौजूद थीं। लेकिन रिश्ते वजहें नहीं गिनते, वे तो बस इंतज़ार गिनते हैं।

धीरे-धीरे भाई ने भी फ़ोन करना कम कर दिया।

ज्योति के मन में एक कसक उठने लगी।
“शायद उन्हें भी अब मेरी परवाह नहीं रही…”

फिर वह खुद को समझा लेती—
“चलो, सब अपनी-अपनी ज़िंदगी में व्यस्त हैं।”

लेकिन दिल तर्क नहीं समझता। उसे तो बस अपनों की आवाज़ चाहिए होती है।

एक रात अचानक भाभी का फ़ोन आया। आवाज़ काँप रही थी।
“ज्योति… तुम्हारे भैया को हार्ट अटैक आया है। अस्पताल में हैं।”

ज्योति के हाथ से फ़ोन लगभग छूट गया। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसे लगा जैसे किसी ने उसके पैरों तले की ज़मीन खींच ली हो। रातोंरात वह अस्पताल पहुँची।

आईसीयू के बाहर बैठी तो लगा जैसे बरसों का मौन सामने कुर्सी खींचकर बैठ गया हो।

वह रो रही थी। अपने लिए नहीं…
उन सैकड़ों बातों के लिए जो उसने कभी की ही नहीं।
उन संदेशों के लिए जिनका जवाब बाद में देना था।
उन फ़ोनों के लिए जिन्हें उसने सोचकर टाल दिया था कि—
“कल बात कर लूँगी।”

कितने “कल” बीत गए थे। और अब वह अस्पताल के उस ठंडे गलियारे में बैठी यही प्रार्थना कर रही थी कि बस एक बार भैया आँखें खोल दें।

उस रात पहली बार उसे एहसास हुआ कि हम अक्सर मान लेते हैं कि हमारे अपने हमेशा हमारे पास रहेंगे। लेकिन ज़िंदगी कोई वादा नहीं करती।

कुछ घंटों बाद डॉक्टर ने बताया कि हालत स्थिर है। ज्योति धीरे-धीरे कमरे में गई। भाई की आँखें खुली थीं। चेहरा कमज़ोर था, लेकिन मुस्कान वही पुरानी। उन्हें देखते ही ज्योति की हिम्मत टूट गई।

वह उनके पास बैठ गई। आँसू रुक नहीं रहे थे। बस इतना कह पाई—
“भैया… माफ़ कर दो।”

भाई ने आश्चर्य से उसे देखा। फिर कमज़ोर हाथ उठाकर उसकी हथेली अपने हाथ में ले ली। कुछ नहीं पूछा। कोई शिकायत नहीं की। यह भी नहीं कहा कि तूने फ़ोन क्यों नहीं किया।

बस उसकी हथेली को हल्के से दबा दिया। उस एक स्पर्श में बरसों की बातें थीं।

ज्योति को अचानक बचपन याद आ गया।

वही भैया, जो स्कूल जाते समय उसका बस्ता उठाकर चलते थे।

वही भैया, जो मेले में उसकी पसंद का खिलौना लेने के लिए अपनी जेबखर्च बचा लेते थे।

वही भैया, जो माँ की डाँट से बचाने के लिए हर शरारत का दोष अपने सिर ले लेते थे।

राखी के दिन वही सबसे पहले हाथ आगे बढ़ाते थे और कहते—
“देखना, मैं हमेशा तेरे साथ रहूँगा।”

और सचमुच…
वे हमेशा साथ रहे।
दूरियाँ आईं।
बातें कम हुईं।
ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं।
लेकिन साथ नहीं टूटा।
कुछ टूटा था तो बस संवाद।

उस रात अस्पताल की कुर्सी पर बैठे-बैठे ज्योति ने अपना फ़ोन निकाला। कॉल लॉग खोला। भाई का नाम सामने था। आख़िरी बार उन्होंने उसे तीन महीने पहले फ़ोन किया था।

उसके बाद न कोई कॉल, न कोई लंबी बात।

ज्योति की आँखों से आँसू फिर बह निकले। उसे महसूस हुआ कि,
रिश्ते एक दिन में नहीं टूटते। वे धीरे-धीरे हमारी व्यस्तताओं के नीचे दब जाते हैं। और फिर एक दिन अचानक डर लगता है कि कहीं बहुत देर न हो जाए।

सुबह जब भाई की तबीयत कुछ संभली, तो उन्होंने मुस्कुराकर कहा—
“पगली… भाई-बहन के रिश्तों में भी कभी माफ़ी होती है क्या?”

ज्योति ने सिर झुका लिया। वर्षों का बोझ जैसे एक पल में उतर गया। उसने अपना सिर भाई के कंधे पर रख दिया।

दोनों कुछ नहीं बोले।

लेकिन उस मौन में जितनी बातें थीं, उतनी शायद शब्दों में कभी नहीं हो सकती थीं।

उस दिन ज्योति ने जाना—
कुछ रिश्ते रोज़ बात करने से नहीं चलते,
वे विश्वास से चलते हैं।

कुछ लोग हमारे जीवन में ऐसे होते हैं जिन्हें बार-बार अपने प्रेम का प्रमाण नहीं देना पड़ता। वे हमारी चुप्पियों में भी हमारा हाल पढ़ लेते हैं।

क्योंकि—
“विश्वास होगा तो मौन भी समझा जाएगा,
विश्वास नहीं होगा तो शब्द भी ग़लत समझे जाएँगे।”
और
शायद दुनिया में सबसे सुरक्षित जगह कोई घर नहीं होता,
कोई शहर नहीं होता,
बल्कि वह एक दिल होता है—
जहाँ बिना कुछ कहे भी कोई हमें समझ ले।

✍🏻 आरती परीख ८.६.२०२६

जिंदगी जो सिखाए…

ज़िंदगी जो सिखाए, सीखते हैं चलो,
राह में जो मिले, देखते हैं चलो।
कौन-सा पाठ कब काम आ जाए,
कौन-सी बात पहचान बन जाए।।

ज़िंदगी जो सिखाए, सीखते हैं चलो,
दिल में उम्मीद के दीप जलाते हैं चलो।।

धूप ने तपना सिखाया,
छाँव ने ठहरना सिखाया।
ठोकरों ने गिरकर उठना,
वक़्त ने सँवरना सिखाया।।

हर कहानी कुछ कह जाती है,
हर निशानी नई राह दिखाती है।
कौन-सा पाठ कब काम आ जाए,
कौन-सी बात पहचान बन जाए।।

ज़िंदगी जो सिखाए, सीखते हैं चलो…।
दिल में उम्मीद के दीप जलाते हैं चलो।।

कुछ सबक़ रिश्तों से मिलते हैं,
कुछ तन्हाई में भी खिलते हैं।
कुछ आँसू मोती बन जाते हैं,
कुछ सपने सच में ढलते हैं।।

हर मौसम संदेशा लाए,
हर अनुभव रंग भर जाए।
कौन-सा पाठ कब काम आ जाए,
कौन-सी बात पहचान बन जाए।।

ज़िंदगी जो सिखाए, सीखते हैं चलो,
राह में जो मिले, देखते हैं चलो।
कौन-सा पाठ कब काम आ जाए,
कौन-सी बात पहचान बन जाए।।

चलते-चलते मंज़िल आ जाए,
सीखों के दीप जगमगाए।
ज़िंदगी की इस पाठशाला में,
हर दिन नया अध्याय बन जाए।।

कौन-सा पाठ कब काम आ जाए,
कौन-सी बात पहचान बन जाए…।।

✍🏻 आरती परीख ७.६.२०२६

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जीवन

इस सूनी दीवारों की चुप्पी में,
किसने हरियाली का दीप जलाया?

पत्थरों के इस बेजान शहर में,
किसने मिट्टी का हक़ लौटाया?

बंद मकानों, बंद दिलों में,
किस पंछी ने स्वर छेड़ दिया?

तब हवा ने भी फुसफुसाकर कहा—
“जीवन कब रुक पाया है?”

जिसे दुनियावाले खंडहर कहते थे,
उसी वीरान इमारत ने बीज बचाया।

बालकनी में टहुकार क्या सुनाई दी,
दरारों से पीपल फिर मुस्कुराया…!

✍🏻 आरती परीख ६.६.२०२६

જીવનસંગ્રામ

સાંચવી સાંજ ને રાખજે,
હોંઠ પર મૌનને રાખજે,
~
તુટશે લાખ શમણાં છતાં
આંખમાં આભને રાખજે.
~
ચિંધશે રાહ ખોટો કદી
કેળવી આંખને રાખજે.
~
થાય ઈર્ષા કદી દોસ્તને
ધ્યાનમાં વાતને રાખજે.
~
જીતશું આખરી દાવ પણ
સાંચવી આગને રાખજે.
~
પળ બધી થઈ જશે આગવી
મસ્ત તું આજને રાખજે.
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જીતવો હોય જો જંગ તો
દાવમાં જાતને રાખજે.

✍🏻 આરતી પરીખ

चेहरों का मदिरालय

कहानी : “चेहरों का मदिरालय

शहर के पुराने हिस्से में एक तंग-सी गली थी, जहाँ रातें दिन से लंबी और ख़ामोशियाँ बातों से ज़्यादा शोर करती थीं।

उसी गली के आख़िरी मोड़ पर एक छोटा-सा मदिरालय था। कहने को वह शराबखाना था, पर वहाँ शराब से ज़्यादा लोग अपने टूटे हुए हिस्से पीने आते थे।

एक रात वहाँ एक अजनबी आया। उसने देखा कि कमरे में बहुत सारे चेहरे हैं। कुछ हँस रहे हैं, कुछ रो रहे हैं, कुछ एक-दूसरे से मुँह फेरकर बैठे हैं। किसी के हाथ में बोतल है, किसी के सामने खाली गिलास।

अजनबी ने हैरानी से पूछा,
“इतने लोग… और सब इतने ख़ामोश क्यों हैं?”

बार का बूढ़ा मालिक मुस्कुराया।
“ये लोग नहीं हैं।”

अजनबी चौंका।
“फिर?”

बूढ़े ने सामने रखे आईने की ओर इशारा किया।
“ये एक ही आदमी के चेहरे हैं।”

अजनबी ने ध्यान से देखा। वाक़ई… हर चेहरे में कुछ समान था— आँखों की थकान, होठों की दरार और भीतर कहीं छिपा हुआ एक अकेलापन।

बूढ़ा बोला,
“यह जो कोने में बैठा है,
यह उसका पछतावा है।

जो बोतल को घूर रहा है,
वह उसकी अधूरी इच्छाएँ हैं।

जो दूसरों की ओर देखता भी नहीं,
वह उसका अहंकार है।

जो चुपचाप रो रहा है,
वह उसका प्रेम है,
जिसे कभी जवाब नहीं मिला।”

अजनबी धीरे-धीरे उन चेहरों को देखने लगा। हर चेहरा जैसे किसी और कहानी का पात्र था, लेकिन सबकी धड़कन एक ही थी।

कुछ देर बाद उसकी नज़र एक चेहरे पर ठहर गई। वह न रो रहा था, न हँस रहा था। बस दूर कहीं देख रहा था, मानो किसी ऐसे कल को खोज रहा हो
जो कभी आया ही नहीं।

“और यह?” अजनबी ने पूछा।

बूढ़े ने गहरी साँस ली।
“यह उम्मीद है। सबसे ज़्यादा घायल,
फिर भी सबसे आख़िर तक ज़िंदा रहने वाली।”

अजनबी कुछ कह न सका। उसे लगा जैसे कमरे की हर बोतल में कोई भावना कैद है, हर गिलास में कोई अधूरी कहानी और हर चेहरा अपने हिस्से का सत्य छिपाए बैठा है।

तभी बूढ़े ने धीमे स्वर में कहा—
“हर चेहरा एक जाम था,
हर जाम में एक किस्सा;
मगर जो सबसे ज़्यादा टूटा था,
वही सबसे ज़्यादा हँसता दिखा।”

कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया।
अजनबी ने आईने में देखा तो एक पल के लिए उसे लगा कि, वहाँ बैठे सारे चेहरे उसी के हैं।

कुछ बोतलों में कैद,
कुछ यादों में,
कुछ घावों में,
कुछ मुस्कानों के पीछे।

उसने घबराकर नज़रें फेर लीं। फिर पूछा,
“तो असली आदमी कहाँ है?”

बूढ़ा कुछ देर चुप रहा। उसने सबसे बड़ी बोतल उठाई। उसके पीछे एक धुँधला-सा चेहरा दिखाई दिया।

न हँसी।
न आँसू।
न शिकायत।
बस एक थकी हुई शांति।

“वो रहा।”

“ये कौन है?”

बूढ़े ने उत्तर दिया,
“यह वह है जो पूरी उम्र अपने ही बनाए चेहरों के पीछे छिपा रहा।
कभी सफल बनने का चेहरा,
कभी मज़बूत बनने का,
कभी खुश होने का।
इतने चेहरे पहन लिए कि
खुद का असली चेहरा ही भूल गया।”

अजनबी की आँखें उस चेहरे पर टिक गईं। उसे पहली बार महसूस हुआ कि,
आदमी दुनिया से कम,
खुद से ज़्यादा छिपता है।
वह अपने भीतर टूटता है,
फिर मुस्कान से दरारें ढँक देता है।
रोता है,
तो आँखों में नहीं—
आदतों में।
और अकेला होता है,
तो भीड़ में।

बाहर कहीं सुबह होने लगी थी। अजनबी उठकर दरवाज़े तक पहुँचा। फिर अचानक मुड़ा।
“क्या यह मदिरालय हमेशा यहीं रहेगा?”

बूढ़ा मुस्कुराया।
“जब तक इंसान अपने सच से भागता रहेगा,
यह मदिरालय भी ज़िंदा रहेगा।
बस इसके पते बदलते रहेंगे—
कभी किसी बार में,
कभी किसी घर में,
कभी किसी दफ़्तर में,
और कभी किसी मुस्कुराते चेहरे के भीतर।”

अजनबी बाहर निकल आया।
गली वही थी,
शहर वही था,
दुनिया भी वही।
लेकिन अब उसे समझ आ गया था—
चेहरों की सराय।
जहाँ लोग नहीं ठहरते,
उनके मुखौटे ठहरते हैं।
और रात भर
एक-दूसरे से छिपते-छिपाते
अपनी-अपनी कहानी सुनाते हैं।
क्योंकि
इंसान शराब से नहीं,
अपने भीतर बसे अनगिनत चेहरों से नशे में रहता है।
और
सबसे कठिन काम
शराब छोड़ना नहीं,
बल्कि
उन सभी चेहरों को उतारकर
अपने असली चेहरे के साथ जीना है।

✍🏻 आरती परीख

धारा का रहस्य

कहानी : “धारा का रहस्य

गाँव के बाहर बहने वाली उस पतली-सी धारा को सब “भूली हुई नदी” कहते थे।

न जाने कब से वह वहाँ बह रही थी। बरसात में उफनती, सर्दियों में शांत हो जाती, और गर्मियों में भी अपनी पतली-सी रेखा बचाए रखती। गाँव के बुज़ुर्ग कहते थे कि बहुत पहले वहाँ एक बड़ा और समृद्ध गाँव बसा था। फिर एक ऐसी बाढ़ आई कि घर, गलियाँ, खेत—सब कुछ पानी में समा गए। लोग दूसरी जगह बस गए, लेकिन यह धारा वहीं रह गई, मानो किसी की प्रतीक्षा कर रही हो।

उन्नीस वर्ष की गौरी को बचपन से ही उस धारा से एक अनजाना लगाव था। जब भी मन उदास होता, वह उसके किनारे आ बैठती और पानी को बहते हुए देखती रहती।

एक दिन गर्मी की सुनहरी दोपहर में वह धारा के किनारे पहुँची। पेड़ों की छाँव पानी पर झुक आई थी और सूर्य की किरणें लहरों पर ऐसे बिखर रही थीं जैसे किसी ने हजारों छोटे दीप जला दिए हों।

तभी उसकी नज़र पानी के बीच चमकती किसी वस्तु पर पड़ी। वह सावधानी से आगे बढ़ी। घास के बीच हाथ डालकर उसने उसे निकाला। वह एक छोटी-सी पीतल की चाबी थी।

चाबी पुरानी थी, पर उस पर जंग का कोई निशान नहीं था। मानो अभी-अभी किसी ने उसे पानी में रखा हो। गौरी उसे घर ले आई।

उस रात उसे एक अजीब सपना आया। सपने में एक बूढ़ी स्त्री सफ़ेद साड़ी पहने धारा के उस पार खड़ी थी। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति थी। वह मुस्कुराई और बोली—
“जिसका ताला खो गया है, उसकी कहानी भी खो गई है।”

गौरी कुछ पूछ पाती, उससे पहले ही उसकी नींद खुल गई। सुबह होते ही वह फिर धारा के पास पहुँच गई।

इस बार उसने पानी के बहाव को ध्यान से देखा। धारा एक जगह अचानक मुड़कर घने वृक्षों के बीच गायब हो जाती थी। जिज्ञासा उसके कदमों को आगे बढ़ाती गई।

चलते-चलते उसे लगा मानो वह किसी साधारण पगडंडी पर नहीं, बल्कि समय की किसी पुरानी परत पर चल रही हो।

कुछ रास्ते मंज़िल तक नहीं,
यादों तक ले जाते हैं।

धारा का स्वर भी आज कुछ अलग था। उसमें समुद्र तक पहुँचने की बेचैनी नहीं थी। वह जैसे किसी पुराने किस्से को बार-बार दोहरा रही हो।

कुछ नदियाँ समुद्र में नहीं,
अपने अतीत में बहती हैं।

शायद यही अतीत उसे अपनी ओर बुला रहा था।

थोड़ी दूर आगे बढ़ने पर उसे झाड़ियों के पीछे पत्थरों से बना एक टूटा हुआ चबूतरा दिखाई दिया। ऐसा लगता था मानो वर्षों से किसी ने उसे छुआ तक न हो। चबूतरे के नीचे मिट्टी कुछ उभरी हुई थी। गौरी ने हाथों से मिट्टी हटानी शुरू की। कुछ देर बाद लोहे का एक पुराना संदूक दिखाई दिया। उस पर एक भारी ताला लगा था। गौरी का दिल तेज़ी से धड़कने लगा। उसने जेब से पीतल की चाबी निकाली और ताले में लगा दी।

टक! ताला खुल गया।
संदूक का ढक्कन धीरे-धीरे ऊपर उठा।
गौरी ने साँस रोक ली।
पर भीतर न सोना था, न चाँदी।

संदूक में रखी थीं कुछ पुरानी तस्वीरें, कई पीले पड़ चुके पत्र, और चमड़े के आवरण वाली एक मोटी डायरी।

गौरी ने काँपते हाथों से डायरी खोली।
पहले पृष्ठ पर लिखा था—
“यदि यह डायरी किसी को मिले, तो समझना कि हमारा गाँव पूरी तरह नहीं डूबा। हमारी स्मृतियाँ अभी जीवित हैं।”

यह उसी गाँव के शिक्षक की डायरी थी, जो बाढ़ के समय लापता हो गए थे। गौरी पढ़ती गई। डायरी में गाँव का इतिहास दर्ज था। किसने पहला स्कूल बनवाया था। किस किसान ने अकाल के दिनों में अपना अनाज सबमें बाँट दिया था। किस स्त्री ने महामारी के समय गाँव भर की सेवा की थी। किस बच्चे ने पहली बार नदी पर लकड़ी का पुल बनाया था। हर पन्ने में किसी न किसी इंसान की कहानी थी।

गौरी को महसूस हुआ कि वह केवल कागज़ नहीं पढ़ रही, बल्कि उन लोगों की धड़कनें सुन रही है जो वर्षों पहले इस धरती पर जी चुके थे।

डायरी के अंतिम पृष्ठ पर शिक्षक ने लिखा था—
“यदि कभी कोई इन पन्नों तक पहुँचे, तो उसे बताना कि गाँव केवल ईंटों और छतों से नहीं बनता। गाँव उसकी यादों, प्रेम और लोगों की कहानियों से बनता है।”

गौरी की आँखें नम हो गईं। अगले दिन उसने सारी सामग्री गाँव की पंचायत को सौंप दी। धीरे-धीरे उन दस्तावेज़ों के आधार पर पुराने गाँव का इतिहास फिर से संकलित किया गया।

लोगों ने अपने पूर्वजों के नाम पहचाने। पुरानी तस्वीरों में अपने परिवारों की झलक देखी। बुज़ुर्गों ने भूली हुई घटनाएँ फिर से सुनानी शुरू कर दीं।

कुछ महीनों बाद धारा के किनारे एक छोटा-सा स्मृति उद्यान बनाया गया। उसी चबूतरे को सँवारकर वहाँ एक पत्थर स्थापित किया गया। उस पर लिखा था—

“जो अपनी कहानियाँ बचा लेते हैं,
वे समय से कभी नहीं हारते।”

उद्यान के उद्घाटन वाले दिन गाँव के सबसे वृद्ध व्यक्ति ने गौरी के सिर पर हाथ रखकर कहा—

“बेटी, तुमने कोई खज़ाना नहीं खोजा। तुमने हमें हमसे मिलाया है।”

गौरी मुस्कुरा दी। उसने धारा की ओर देखा। पानी वैसे ही बह रहा था—शांत, निर्मल और गहरा। मानो उसका काम पूरा हो चुका हो।

आज भी जब शाम की सुनहरी रोशनी उस धारा पर पड़ती है, तो पानी के बीच कहीं एक चमक दिखाई देती है। गाँव वाले कहते हैं कि वह वही पीतल की चाबी है।

क्योंकि कुछ रहस्य कभी समाप्त नहीं होते। वे बस अगली कहानी की प्रतीक्षा करते हैं।

और वह धारा… वह आज भी समुद्र की ओर नहीं बहती। वह अब भी अपने अतीत में बहती है।

“वक़्त सब कुछ बहा ले जाता है,
पर कुछ धाराएँ यादों की रखवाली करती रहती हैं।”

✍🏻 आरती परीख ३.६.२०२६

झील किनारे शाम

झील किनारे शाम

झील किनारे शाम ढली है,
मन में कोई बात चली है।
सूरज ने जब रंग बिखेरे,
याद तुम्हारी साथ चली है॥

पानी पर सोने की चादर,
बादल जैसे सपनों के घर,
धीरे-धीरे हवा कहे कुछ,
दिल सुनता है उसका स्वर।

राहों पर कुछ लोग मिले थे,
फिर भी कैसी तन्हाई है,
भीड़ भरे इस सुंदर क्षण में,
बस तेरी ही परछाईं है।

झील किनारे शाम ढली है,
मन में कोई बात चली है॥

पंछी लौटे अपने घर को,
दिन ने ओढ़ी रात की चादर,
नभ के कोने में चुपके से
जल उठे उम्मीद के दीपक।

लहरों जैसी उम्र हमारी,
आना-जाना, मिलना-बिछड़ना,
फिर भी हर इक डूबते सूरज में
सीखा हमने फिर से उगना।

झील किनारे शाम ढली है,
मन में कोई बात चली है॥

जीवन भी इस झील सरीखा,
गहरा, शांत, अथाह कहीं,
ऊपर कितनी हलचल दिखती,
भीतर लेकिन चाह वहीं।

जो खोया वो धुंध हुआ है,
जो पाया वो प्रकाश बना,
डूबते सूरज ने सिखलाया—
अंत नहीं, हर अंत नया।

झील किनारे शाम ढली है,
मन में कोई बात चली है।
सूरज ने जब रंग बिखेरे,
याद तुम्हारी साथ चली है॥

✍🏻 आरती परीख १.६.२०२६

पहचान

तारीफ नहीं
खुश्बू से पता चला-
कौन सा फूल
✍🏻 आरती परीख

શાન

એક ઘર બાંધવું આંખમાં,
એમ નભ આંબવું શાખમાં,

છે પતનની નિશાની સદા
તો, ઈર્ષાથી હવે ઝાંખમાં,

કૂથલી તો વગોવે ઘણી
માંયલો કાદવે નાખમાં,

આખરી દાવને ખેલવા
હામને સાચવું પાંખમાં,

જિંદગી જીવવી શાનથી,
છે અલગ ‘આરતી’ લાખમાં.

✍️ આરતી પરીખ

इश्क़

इश्क़

घर की साँस

छवि विचार :
कहानी : “घर की साँस”

शहर से बहुत नजदीक एक पुराने गांव के बीचों-बीच एक पुराना घर था। उस घर के आँगन में एक बहुत बड़ा नीम का पेड़ था।

उस पेड़ के नीचे दादाजी हर शाम चारपाई डालते, दादी तुलसी को पानी देतीं और बच्चे वहीं खेलते-खेलते बड़े हो रहे थे।

गर्मी में वही पेड़ छाँव देता, बरसात में पत्तों से टपकती बूंदें संगीत लगतीं और सर्दियों में उसकी धूप सबसे प्यारी जगह बन जाती।

घर छोटा था… पर उसमें सुकून बहुत था।

फिर वक्त बदला। बच्चे बड़े हो गए। ज़रूरतें भी बड़ी हो गईं।

एक दिन बेटे राघव ने कहा —
“पापा, ये पेड़ बहुत जगह घेरता है। अगर इसे कटवा दें तो यहाँ एक कमरा और बन जाएगा… और कार पार्किंग भी।”

दादाजी कुछ देर चुप रहे। उन्होंने बस पेड़ को देखा। ऐसे… जैसे कोई अपना खड़ा हो।

लेकिन घर में पैसों की तंगी थी। बात मान ली गई। अगले दिन कुल्हाड़ी चली।

जब पेड़ गिरा, तो पहली बार घर का आँगन बहुत बड़ा लगने लगा… और घर बहुत खाली। धीरे-धीरे नया कमरा बन गया। थोड़ी पैसों की छूट हुई तो घर में कार भी आ गई। दीवारें चमकने लगीं।

पर पता नहीं क्यों — अब दादी शाम को बाहर नहीं बैठती थीं। दादाजी की चारपाई भी अंदर चली गई। बच्चे मोबाइल में खो गए। और सबसे अजीब बात… अब घर में बातें कम होने लगी थीं।

एक दिन तेज़ गर्मी में बिजली चली गई। कमरे भट्टी जैसे तप रहे थे। सब बाहर निकले… मगर बाहर अब छाँव नहीं थी।

दादाजी चुपचाप उस जगह को देखते रहे
जहाँ कभी नीम खड़ा था। तभी छोटे पोते मयंक ने पूछा —
“दादाजी… पेड़ काटने के बाद घर इतना गर्म क्यों हो गया?”

दादाजी की आँखें भर आईं। उन्होंने धीरे से कहा —
“बेटा… हमने सिर्फ़ पेड़ नहीं काटा, घर की ठंडक काट दी… बैठक काट दी…
और शायद… अपनों के बीच का वक़्त भी।”

उस रात पहली बार घर के सभी लोग एक साथ बैठे। बहुत देर तक कोई कुछ नहीं बोला।

अगली सुबह, उसी जगह एक छोटा-सा नीम का पौधा लगाया गया।

दादाजी ने मिट्टी डालते हुए छोटे मयंक को कहा —
“घर दीवारों से नहीं बनता… जिस जगह मन को सुकून मिले, वही असली घर होता है। पेड़ सिर्फ़ पेड़ नहीं होते, घर की साँस होते हैं।”

फिर मयंक बड़ा हो गया। पढ़ाई के लिए शहर गया। वहीं नौकरी मिली, पैसा मिला और धीरे-धीरे उसे गाँव छोटा लगने लगा।

अपना गाँव पास में होते हुए भी वो कभी गाँव में रहने आता नहीं था। दादाजी बहुत बूढ़े हो चुके थे और बीमार भी रहते थे। उनकी इच्छा थी कि उनके जीते जी पुस्तेनी घर की मरम्मत हो जाए। उसी चक्कर में सालों बाद जब मयंक लौटा,
तो गाँव बदल चुका था।

कच्चे घरों की जगह पक्की इमारतें थीं, खेतों की जगह कारखाने और हवा में मिट्टी नहीं… धुआँ था।

उसे भी लगा —
“शायद यही तरक्की है।”

शहर की चकाचौंध में वो अपना बचपन भूल गया था। उसने मरम्मत की बजाए दादाजी को यह पुराना घर तोड़कर एक नया बड़ा मकान बनाने का फैसला सुना दिया।

दादाजी इस बार भी कुछ न बोले। बस आँखें भर आई और साँसें धीमी होने लगीं…

इस बार भी बीच में वही नीम खड़ा था। जो उसने दादाजी के साथ मिलकर लगाया था।

मज़दूर बोले —
“साहब, पेड़ हटाना पड़ेगा।”

मयंक ने बिना सोचे हामी भर दी। कुल्हाड़ी चली। पेड़ का आधा हिस्सा गिरा और अचानक एक घोंसला नीचे आ गिरा। उसमें दो छोटे बच्चे थे… एक मर चुका था, दूसरा काँप रहा था।

पास खड़ी उसकी छोटी बेटी डरकर बोली —
“पापा… इनका घर किसने तोड़ा?”

मयंक के पास जवाब नहीं था। उसी पल उसकी नज़र सामने गई। पेड़ का एक हिस्सा अब भी हरा था… पत्तों से भरा, जीवन से भरा। और दूसरा हिस्सा नीचे पड़ा था… टूटा हुआ, बेजान।

न जाने क्यों उसे लगा… जैसे धरती खुद दो हिस्सों में बँटकर उसे देख रही हो।

एक तरफ़ बचपन था, छाँव थी, पक्षियों की आवाज़ थी।
दूसरी तरफ़ धुआँ, गर्मी और अकेलापन।

उस रात मयंक सो नहीं पाया। सुबह उसने मजदूरों को रोक दिया। कटे हुए हिस्से को वहीं छोड़कर उसने बाकी पेड़ बचा लिया।

फिर आर्किटेक के साथ बैठकर उसने अपने गाँव के घर का नक्शा बदला ताकि पेड़ बीच में ही रहे।

अपनी आखरी साँसे गिनते हुए दादाजी को नई जान मिल गई। उनकी तबियत थोड़ी अच्छी होने लगी।

दादाजी की तबियत पूछने आनेवाले लोग हँसे भी। कहने लगे —
“इतने बड़े घर में एक पेड़ के लिए जगह छोड़ दी?”

नीम के नीचे खेलती अपनी बेटी की मासूम शरारतें और दादाजी की ठीक होती तबियत देखता हुआ मयंक मुस्कुरा देता।
बस इतना ही कहता —

“घर बड़ा बनाने के चक्कर में,
मैं ज़िंदगी छोटी करने जा रहा था।”

✍🏻 आरती परीख २७.५.२०२६

जासूस

शहर की पुरानी बस्ती में रेलवे पुल के नीचे एक छोटी-सी चाय की दुकान थी।
वहीं रोज़ शाम एक आदमी आकर बैठता था।

साधारण-सा चेहरा। ना बहुत बूढ़ा, ना बहुत जवान। हल्की दाढ़ी, फीकी शर्ट और हाथ में हमेशा एक अख़बार… जिसका प्रकाशक और शहर बदलता रहता था।

वो किसी से ज़्यादा बात नहीं करता था। बस चाय पीते-पीते आसपास के लोगों को देखता रहता।

चायवाला भी उसे “भाईसाहब” कहकर बुलाता था, क्योंकि उसने कभी अपना नाम नहीं बताया।

उस ग़रीब-सी बस्ती में हर आदमी अपनी लड़ाई में उलझा था। कोई रिक्शा चलाता, कोई सब्ज़ी बेचता तो कोई दिहाड़ी पर जाता। और उन्हीं लोगों में एक लड़का था — समीर। दिन में कॉलेज, शाम को मोबाइल रिपेयर की दुकान। छोटी-सी उम्र में घर, बीमार माँ और छोटी बहन की बड़ी ज़िम्मेदारी।

समीर अक्सर उस आदमी को देखता
और सोचता —
“ये रोज़ यहाँ आकर करता क्या है?”

एक दिन उसने पूछ ही लिया —
“आप किसी का इंतज़ार करते हैं क्या?”

वो आदमी हल्का-सा मुस्कुराया था —
“हाँ… सच का।”

उस दिन समीर हँस पड़ा था। उसे लगा था कि कोई फ़लसफ़ी आदमी होगा।

दिन गुजरते गए।

फिर एक रात बस्ती में अचानक पुलिस की गाड़ियाँ आ गईं। पता चला — इसी इलाके से पिछले एक साल में करीब तीस-चालीस लड़कियाँ गायब हो चुकी थीं। नौकरी का लालच देकर उन्हें दूसरे राज्यों में भेजा जा रहा था।

हर घर में डर उतर आया। हर माँ अपनी बेटी को जल्दी घर बुलाने लगी। बाप की नज़र सख़्त हो गई और भाई में जासूस की आत्मा घुस गई।

लेकिन वो आदमी अब भी रोज़ उसी चाय की दुकान पर पहले की तरह ही आता रहा था।

कभी बस लोगों की बातें सुनता, कभी दूर खड़ी सफेद वैन को देखता, कभी सड़क किनारे पड़े सिगरेट के टुकड़ों तक को गौर से देखता।

उसने किसी से कोई सवाल नहीं पूछा। पर उसकी आँखें जैसे हर जवाब जोड़ रही थीं।

फिर एक सुबह खबर आई — लड़कियों को अगवा करने वाला पूरा गिरोह पकड़ा गया। कई लड़कियों को सुरक्षित वापस लाया गया।

अख़बार में बस खबर छपी। ना किसी अफ़सर की तस्वीर, ना किसी हीरो का नाम।

उस शाम जब समीर चाय की दुकान से गुज़रा, तो उसने देखा — हररोज़ चाय के बहाने वहीं बैठने वाला वो आदमी वहाँ नहीं था।

“कहाँ गए?” समीर ने पूछा।
चायवाले ने कंधे उचकाए।
“सुबह आया था… चाय पी, पैसे दिए और चला गया।”

फिर उसने काउंटर के नीचे से एक पुराना अख़बार निकाला।
“ये भूल गया शायद…”

समीर ने अख़बार खोला। अंदर उसी बस्ती का एक छोटा-सा नक्शा बना था। कुछ जगहों पर आँकड़े लिखे थे, कुछ अजीब-से शब्द… जैसे किसी कोड में कोई संदेश छुपा हो। और सबसे नीचे बस एक लाइन लिखी थी —
“अगला ठिकाना बदल चुका है।”

समीर का माथा सिकुड़ गया। वो कुछ समझ पाता, उससे पहले एक काला वाहन धीरे से सड़क के किनारे आकर रुका। दो आदमी उतरे। उन्होंने पहले चायवाले को देखा, फिर समीर के हाथ से वो अख़बार लिया और बिना कुछ बोले वापस गाड़ी में बैठ गए।

गाड़ी आगे बढ़ी… और मोड़ पर जाकर गायब हो गई।

समीर देर तक सड़क को देखता रहा।
उसके भीतर जैसे सैकड़ों सवाल जाग गए थे।

दिन बीतने लगे।

धीरे-धीरे जो लड़कियाँ नौकरी के बहाने बाहर भेज दी गई थीं, उनमें से कई वापस लौटने लगीं।

हाँ… उनकी आँखों में अब भी डर बचा था, आवाज़ों में काँप थी और मुस्कुराहट जैसे कहीं रास्ते में छूट गई थी… लेकिन वो अपने घर लौट आई थीं। बस्ती में फिर से कुछ माँओं ने महीनों बाद चैन की नींद ली थी।

एक शाम समीर उसी चाय की दुकान पर बैठा था। अचानक उसकी नज़र सामने पड़े अख़बार पर गई। उस अख़बार के कोने पर नीली स्याही से बस एक शब्द लिखा था —

“समाप्त?”

और उसके नीचे बहुत हल्के हाथों से बनाया गया एक छोटा-सा गोला… ठीक वैसा ही जैसा उस नक्शे में बना था।

समीर ने घबराकर सड़क की ओर देखा। भीड़ हमेशा की तरह चल रही थी। रिक्शे, बसें, लोग, शोर… सब सामान्य था।

उसने चायवाले से पूछा तो उसने धीरे से कहा —
“थोड़ी देर पहले एक नीली शर्ट वाला आदमी यहाँ चाय पी रहा था। फिर उसे मिलने चार लोग आए… शायद उन्हीं में से कोई ये अख़बार भूल गया।”

समीर अचानक चुप हो गया। उसने भीड़ में नज़र दौड़ाई। हर चेहरा अब उसे साधारण नहीं लग रहा था। कौन किसे देख रहा है… कौन किस पर नज़र रखे हुए है… कुछ समझ नहीं आ रहा था।

उसी पल उसे पहली बार एहसास हुआ —

कुछ लोग कभी जाते नहीं।
वे बस अगले अँधेरे की तरफ़ बढ़ जाते हैं।

और शायद…
इसीलिए असली जासूस
कहानियों में नहीं,
सिर्फ़ परछाइयों में मिलते हैं।

✍🏻 आरती परीख २२.५.२०२६

संवाद

“तुम बदल गए हो…”
रात के सन्नाटे में इतना भर कहा था उसने और कमरे की दीवारों ने जैसे अपनी साँस रोक ली थी।

वो खिड़की के पास खड़ी थी, हाथ में आधा ठंडा चाय का कप, और मैं —
मोबाइल की स्क्रीन पर उँगलियाँ चलाता हुआ, मानो बहुत ज़रूरी दुनिया संभाल रहा हूँ।

मैंने बिना नज़र उठाए पूछा —
“ऐसा क्यों लगा तुम्हें?”

वो हल्का-सा हँसी, वैसी हँसी… जो रोने से बस एक कदम दूर होती है।

“पहले,”
उसने धीरे से कहा,
“तुम मेरे शब्द सुनते थे,
अब सिर्फ़ जवाब देते हो।”

कमरे में चुप्पी उतर आई।

बाहर कहीं दूर कुत्ते भौंक रहे थे, घड़ी की टिक-टिक और तेज़ सुनाई देने लगी थी।

मैंने पहली बार मोबाइल नीचे रखा।
“इतना भी बुरा हो गया हूँ क्या?”

उसने मेरी तरफ़ देखा। आँखों में शिकायत कम, थकान ज़्यादा थी।

“बुरे नहीं हुए… बस व्यस्त हो गए हो। इतने व्यस्त, कि अब मेरे ‘हूँ’ और ‘ठीक हूँ’ के बीच का फर्क भी नहीं समझते।”

उसका हर शब्द धीरे-धीरे भीतर उतर रहा था।

मुझे याद आया — एक समय था, जब उसकी चुप्पी भी पूरी कहानी कह देती थी।

और आज… वो बोल रही थी,
फिर भी मैं वर्षों से उसे सुन नहीं पाया था।

मैं उसके पास जाकर बैठ गया।
“तो क्या करूँ?”
मैंने सचमुच पूछा।

उसने पहली बार सीधे मेरी आँखों में देखा।
“संवाद बचा लो… रिश्ते अपने आप बच जाएँगे।”

उस रात बहुत देर तक हमने कोई बड़ी बातें नहीं कीं। बस छोटी-छोटी बातें…

कैसी लगी चाय,
दिन कैसा था,
पुराने दिनों में
हम इतना हँसते क्यों थे,
और अब
इतना चुप क्यों रहते हैं।

सुबह जब खिड़की से धूप अंदर आई, तो लगा — घर वही था, लोग वही थे, पर कुछ लौट आया था।

शायद…
बातचीत।

क्योंकि,
रिश्ते झगड़ों से नहीं टूटते, चुप्पियों से टूटते हैं।
और कई बार,
सिर्फ़ एक सच्चा संवाद बरसों की दूरियाँ पिघला देता है।

✍🏻 आरती परीख

यादों का घरौंदा

छवि विचार — कहानी : “यादों का घरौंदा

गाँव के बाहर, पुरानी पगडंडी के मोड़ पर एक सूखा पेड़ खड़ा था। न उस पर पत्ते थे, न फूल, न किसी चिड़िया का बसेरा। गाँव के लोग उसे “मरा हुआ पेड़” कहते थे।

शाम ढलते ही जब सूरज अपनी आख़िरी किरणें धरती पर बिखेरता, तो उस पेड़ की लंबी परछाई सड़क तक चली आती। गाँव वाले जल्दी-जल्दी वहाँ से निकल जाते। किसी को उसका सूना खड़ा रहना डराता, किसी को उदास करता।

लेकिन एक बूढ़ा आदमी हर रोज़ शाम को
उसी पेड़ के नीचे आकर बैठता था। हाथ में पुरानी लकड़ी की छड़ी, आँखों में धूप से फीकी पड़ी यादें। वह पेड़ से बातें करता।

“याद है… जब तेरी डालियों पर झूला पड़ता था? जब बच्चे तेरे आम तोड़ने के लिए पत्थर मारते थे? जब सावन में तू पूरा हरा हो जाता था?”

पेड़ चुप रहता… जैसे बूढ़े लोग रहते हैं।

एक दिन गाँव के एक लड़के ने पूछ ही लिया,
“दादा, आप रोज़ इस सूखे पेड़ के पास क्यों आते हो? इसमें अब बचा ही क्या है?”

बूढ़ा मुस्कुराया और धीरे से बोला,
“बेटा, तुम इसे सूखा पेड़ देखते हो… मैं इसमें अपना गुज़रा हुआ वक़्त देखता हूँ।”

लड़का चुप हो गया। बूढ़े ने पेड़ के तने पर हाथ फेरा, जैसे किसी पुराने दोस्त के कंधे पर हाथ रखते हैं।
फिर बोला,
“जब मेरी पत्नी ज़िंदा थी, हम दोनों इसी पेड़ के नीचे बैठते थे। वो बातें करती रहती… मैं बस उसे सुनता रहता। जब मेरा बेटा छोटा था, यहीं मिट्टी में खेलता था और जब घर में किसी से मन दुखता, तो मैं यहीं आ जाता। इस पेड़ ने मुझे कभी टोका नहीं… बस हर मौसम में मेरे साथ खड़ा रहा।”

शाम और गहरी हो गई थी। आसमान में पक्षियों के झुंड अपने घर लौट रहे थे। लड़के ने पहली बार उस पेड़ को
ध्यान से देखा।
उसे लगा—
पेड़ सूखा ज़रूर है, लेकिन खाली नहीं।
उसमें किसी की हँसी अटकी है, किसी की प्रतीक्षा, किसी की अधूरी बातें, किसी की पूरी ज़िंदगी।

उस दिन के बाद गाँव वालों ने उस पेड़ को
“सूखा पेड़” कहना छोड़ दिया। अब बच्चे उसे नए नाम से पुकारते थे—
“यादों का घरौंदा”!
✍🏻 आरती परीख २०.५.२०२६

दश्त और गृहिणी

दश्त और गृहिणी –
दोनों चुप्पी के भीतर छुपी ख़ुशी का राज़।
एक जो;
चुपके से बिखर जाती है
रेत के कणों में,
दूसरी,
जो घर के कोनों में
अपनी हलकी मुस्कान समेटे रखती है।

दश्त की वीरानी में कहीं,
अचानक एक रंगीन फूल खिल उठता है,
जैसे
गृहिणी की सुबह की चाय में छुपी — एक मीठी ख़ुशी।
जो न शोर मचाती है,
न किसी को दिखती है,
लेकिन एक अजनबी को भी चैन देती है।

हर कदम में,
हर सांस में,
दश्त का निरंतर संघर्ष छुपा है,
जैसे
गृहिणी के हाथों में छुपी — थकी हुई ताकत,
जो हर काम को संजीवनी देती है,
घर की धड़कन बनती है,
बिना किसी शब्द के।

सांसों की गर्मी से रेंगते हैं — समय के कीड़े,
फिर भी; उसके चेहरे पर एक निरंतर मुस्कान है,
जैसे दश्त में कभी कहीं — एक छोटी सी दरिया,
जो
बिना किसी को बताए,
अपना रास्ता बना लेती है।

यहां,
हर कण में तपिश है,
हर दिन एक परीक्षा,
लेकिन
हर परीक्षा के बाद,
एक नई उम्मीद उगती है —
जैसे
गृहिणी के आँचल से निकली कोई नन्ही हँसी,
जो
पूरी दुनिया को रोशन कर दे।

दश्त भी कभी बरसात को महसूस करता है,
और
गृहिणी भी कभी खुद के लिए मुस्कुराती है,
क्योंकि
सच्चा सौंदर्य,
सच्चा जीवन,
बस देने में है — बिना मांगे, बिना थमे।

अंत में,
इन दोनों के भीतर बसी गहराइयों से
एक ही आवाज़ आती है —
कि,
जहां सब कुछ सूखा लगे,
वहीं जीवन की सबसे कोमल नमी छुपी होती है।

तो
जब भी लगे कि — दुनिया वीरान है,
या
तुम्हारा श्रम व्यर्थ गया,
तब
दश्त को देखो…
और
एक गृहिणी को समझो —
तुम जान जाओगे कि,
सत्य, सुंदरता और ख़ुशी
हमेशा बाहर नहीं, भीतर खिलती है!
✍🏻 आरती परीख

*दश्त = रेगिस्तान
*दरिया = नदी

विदेश में देशी COOK

विदेशी धरती, लक्ज़ूरियस विला,
मन में देसी गाँव लिए,
आए रसोई वाले महाराज
पाँच सितारा ठाँव लिए।

कहते हैं— “हमने होटल में
बड़े-बड़ों को स्वाद खिलाया,”
लेकिन उनकी दाल ने अक्सर
सच का पर्दा खुद सरकाया।

माथे पर रूमाल बँधा रहता,
हाथों में चाकुओं की फ़ौज,
चलते ऐसे किचन भीतर
जैसे रण में कोई मौज।

हर सब्ज़ी का नाम विदेशी—
“रॉयल फ्यूज़न शाही डिश,”
ढक्कन खुलते ही लग जाता
आलू को ही नई पॉलिश।

रोटी उनकी ऐसी निकले
जैसे दुनिया का नक्शा हो,
एक किनारा चीन छुए तो
दूजा सीधा अफ्रीका हो।

चावल कभी इतने गलते
जैसे खीर बनाने निकले,
और कभी इतने कच्चे लगते
मानो खेतों से अभी निकले।

मिर्च डालते हाथ खोलकर
मानो बदला लेना हो,
और नमक को ऐसे भूलें
जैसे घर का किराया हो।

मोबाइल पर रीलें चलतीं,
तड़का पीछे जल जाता,
धुएँ में आधा सऊदी लगता,
आधा अपना गाँव नज़र आता।

फिर कहते— “विदेशी गैस है,”
तवा भी बेचारा शरमाता,
कड़ाही चुपचाप कोने में
अपना भाग्य स्वयं पछताता।

हर तीसरे दिन किस्सा छेड़ें—
“ताज होटल में शेफ रहा,”
पर जली हुई उस खीर ने
पूरा इतिहास साफ़ कहा।

मेहमानों के आते ही फिर
उनमें नवाब उतर आता,
धनिया ऊपर ऐसे उड़ता
जैसे नोटों की बरसात।

चाय बनाते तो लगता था
दूध-पानी में युद्ध हुआ,
ऊपर झाग हिमालय जैसी,
नीचे स्वाद लापता हुआ।

तनख़्वाह वाली तारीख़ आए
चेहरा पूरा चाँद लगे,
बाकी दिन तो थकान ओढ़े
जैसे बूढ़ी फ़रियाद लगे।

पर जब सर्दी वाली रातों में
घर की याद रुला जाती,
उनके हाथों की गरम खिचड़ी
माँ की गोदी बन जाती।

तब समझ आया—
इनकी जलती आधी रोटी में भी
थोड़ा अपना गाँव पका है,
परदेस की भागदौड़ में
भारत अब भी साँस लिया है।

ये केवल रसोइए नहीं,
चलती-फिरती यादें हैं,
जो मसालों की खुशबू में
घर की चिट्ठी बाँटें हैं।

क्योंकि विदेशों की रसोई में
सिर्फ़ मसाले नहीं पकते,
भारत के छोटे-छोटे गाँव
धीरे-धीरे साथ सिमटते हैं।

और
हर “होटल वाले शेफ” के भीतर
एक छोटा-सा सच पलता है—
व्यंग्य चाहे जितना कर लो,
घर का स्वाद यहीं मिलता है।

✍🏻 आरती परीख १९.५.२०२६

प्रकृति का मौन संगीत

सुबह जब
सूरज अपनी पहली किरण
धरती की हथेली पर रखता है,
तब लगता है जैसे
रात भर रोई हुई दुनिया को
किसी ने चुपके से सहला दिया हो।

पेड़
सिर्फ़ पेड़ नहीं होते,
वे समय के बूढ़े साधु होते हैं—
जो बिना कुछ कहे
धूप, वर्षा, आँधी
सब सहते रहते हैं।

नदी बहती है
तो केवल पानी नहीं बहता,
उसके साथ बहते हैं
पहाड़ों के सपने,
बादलों की यादें
और किनारों की अधूरी बातें।

दोपहर की धूप
जब आँगन में उतरती है,
तो लगता है
जैसे माँ
गुनगुनी रोटी पर
घी की पहली बूंद रख रही हो।

वह तपती जरूर है,
पर भीतर कहीं
जीवन को पकाती भी रहती है।

शाम
बड़ी रंगीन मिज़ाज होती है—
कभी केसर घोल देती है आकाश में,
कभी गुलाबी चूनर ओढ़
धीरे-धीरे उतरती है छतों पर।

लगता है जैसे
दिन भर थका सूरज
अब बादलों की गोद में
सिर रखकर सोना चाहता हो।

और रात…
रात की अपनी ख़ुफ़िया सूरत होती है।
वह अँधेरी कम,
गहरी ज़्यादा होती है।

चाँद
उसकी बंद मुट्ठी में रखा
एक चुप सा राज़ लगता है,
और तारे—
मानो किसी फ़कीर ने
काले आसमान पर
दुआएँ टाँक दी हों।

कभी देखा है तुमने
सूखे पत्तों को गिरते हुए?
वे हारकर नहीं गिरते,
वे मिट्टी को
फिर से जीवन देने उतरते हैं।

बारिश जब आती है,
तो केवल धरती नहीं भीगती—
भीग जाते हैं
मन के वे कोने भी
जहाँ वर्षों से
कोई ऋतु नहीं पहुँची होती।

प्रकृति
अपने अनूठे अंदाज़ में कहती है—
खिलना हो तो फूलों सा खिलो,
झुकना हो तो वृक्षों सा झुको,
और बिखरना भी पड़े
तो बादलों की तरह बिखरो,
ताकि किसी प्यासे की प्यास बन सको।

शायद इसी लिए
पहाड़ इतने शांत हैं,
समुद्र इतना गहरा है
और आकाश इतना विशाल।

प्रकृति जानती है—
शोर से नहीं,
मौन से सृजन होता है।

✍🏻 आरती परीख १९.५.२०२६

अपनापन

रेलवे स्टेशन पर बहुत भीड़ थी। लोग भाग रहे थे… कोई ट्रेन पकड़ने, कोई किसी को छोड़ने, कोई किसी से मिलने।

उसी भीड़ में एक बूढ़ा आदमी प्लेटफ़ॉर्म नंबर तीन की बेंच पर चुपचाप बैठा था।
हाथ में छोटा-सा बैग, आँखों पर मोटा चश्मा और चेहरे पर अजीब-सी थकान।

पास ही एक युवक बार-बार मोबाइल देख रहा था। अचानक बूढ़े आदमी ने उसे पूछा—
“बेटा… मुंबई वाली ट्रेन यहीं आएगी ना?”

युवक ने बिना ऊपर देखे कहा—
“दस मिनट में।”

कुछ देर बाद फिर आवाज़ आई—
“बेटा… अगर कोई अपना लेने न आए,
तो स्टेशन से बाहर ऑटो मिल जाएगा ना?”

इस बार युवक ने नज़र उठाई। वो बूढ़ा आदमी मुस्कुरा तो रहा था, लेकिन आँखें डरी हुई थीं।

“किसके पास जाना है आपको?” युवक ने पूछा।

बूढ़े ने जेब से एक कागज़ निकाला। उस पर एक पता लिखा था।
“बेटे ने बुलाया है… कह रहा था-पापा, अब अकेले मत रहा करो…”
बोलते-बोलते बूढ़े की आवाज़ भारी हो गई।
“पहली बार जा रहा हूँ उसके घर…”

युवक हल्का-सा मुस्कुराया। उसे अच्छा लगा।

ट्रेन आई। भीड़ चढ़ी। ये दोनों भी चढ़ गए। सफ़र में बूढ़ा आदमी लगातार अपने बेटे की बातें करता रहा..
“बहुत बड़ा आदमी बन गया है… मेरे लिए अलग कमरा बनाया है… कहता है, ‘अब आपको अकेले नहीं रहने दूँगा।’”

उसकी आवाज़ में गर्व था। ठीक वैसे… जैसे हर पिता की आवाज़ में होता है, जब वो अपने बेटे का नाम लेता है।

ट्रेन मुंबई पहुँची। स्टेशन पर भीड़ उमड़ पड़ी। बूढ़ा आदमी बार-बार गर्दन उठाकर भीड़ में किसी को ढूँढता रहा। हर बार आँखों में उम्मीद चमकती… और फिर बुझ जाती। बहुत समय बीत गया।

न जाने क्यों पर वो युवक भी वहाँ से हिला नहीं था, वो ये बूढ़े आदमी के नज़दीक ही खड़ा था।

बूढ़े ने अपने बेटे को फोन लगाया। फोन बंद। बहू को फोन किया। सब व्यर्थ..
कुछ देर बाद एक मैसेज आया —
“सॉरी पापा। अभी हमें अचानक विदेश जाना पड़ा। आप फिलहाल किसी आश्रम में रुक जाइए।”

मैसेज पढ़ते ही बूढ़े आदमी के हाथ काँपने लगे। उसने तुरंत फोन जेब में रख लिया… जैसे कोई अपनी बेइज़्ज़ती दुनिया से छिपा लेना चाहता हो।

फिर होंठों पर हल्की-सी मुस्कान लाकर बोला —
“कोई बात नहीं… बच्चे व्यस्त होते हैं।”

लेकिन इस बार आवाज़ पिता की नहीं,
टूटे हुए इंसान की थी।

युवक सब समझ चुका था। उसने धीरे से पूछा —
“अब कहाँ जाएँगे बाबा?”

बूढ़े ने कुछ पल सोचा। फिर बोला—
“पता नहीं बेटा… शायद कहीं भी। अब इस उम्र में आदमी घर नहीं ढूँढता… बस एक कोना ढूँढता है, जहाँ किसी को उसकी मौजूदगी बोझ न लगे।”

ये सुनकर युवक की आँखें भर आईं। उसे सुबह माँ पर किया अपना गुस्सा याद आ गया…
“माँ, हर बात पर फोन मत किया करो…”

वो भीतर से शर्मिंदा हो गया। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने बूढ़े बाबा का बैग उठाया और बोला—
“चलिए बाबा।”

“कहाँ?” बूढ़े ने हैरानी से पूछा।

युवक मुस्कुराया।
“घर.. मेरे साथ।”

बूढ़ा आदमी घबरा गया।
“नहीं बेटा… लोग क्या कहेंगे?”

युवक ने पहली बार उनका हाथ पकड़ा और बोला—
“लोग तो तब भी कुछ नहीं बोले, जब आपका अपना बेटा आपको अकेला छोड़ गया।”

बस इतना सुनना था कि, बूढ़े बाबा की आँखों से आँसू बह निकले। स्टेशन की भीड़ में, शायद पहली बार उन्हें अपना कोई मिला था।

घर पहुंचते ही युवक ने माँ से कहा —
“माँ… आज मैं अकेला नहीं आया।”

माँ ने दरवाज़े पर खड़े बूढ़े बाबा को देखा,
और बिना कुछ पूछे बोलीं—
“अंदर आइए… खाना ठंडा हो रहा है।”

इतना सुनते ही बूढ़े बाबा फूट पड़े…

क्योंकि,
कई बार इंसान को छत नहीं,
सिर्फ़ अपनापन चाहिए होता है।

और सच यही है —
ज़िंदगी का कोई भरोसा नहीं…
लेकिन जब तक ज़िंदगी है,
किसी के हिस्से का अकेलापन कम किया जा सकता है।

✍🏻 आरती परीख १८.५.२०२६