किसी मोड़ पर

ऐसा होता है कि गाहे-बगाहे हम बगीचे में बीज बो कर या पौध लगा कर भूल जाते हैं। एक दिन बीज अंकुरित होकर बाहर निकल आता है।

तब हमारा ध्यान उस बीज पर जाता है जिसे हम भूल चुके होते हैं। अरे इतने दिनों बाद कैसे?

आश्चर्य होता है साथ ही बेइंतहा खुशी भी।

उतनी ही खुशी जितनी कोई खो गए भूले बिसरे दोस्त के लंबे समयांतराल बाद मिलने से होती है और हम बाढ़ के पानी की तरह भड़भड़ा कर उस दोस्त से मिलते हैं।
समय बीतता है… अंकुरित बीज बाहें फैलाए दरख़्त बन जाता है। फिर दरख़्त से एक भावनात्मक लगाव पनपने लगता है।
कितनी समानताएंँ हैं, दरख़्त के बीज और प्रेम के बीज में।
ऐसा ही वर्षों से दबा एक बीज अन्विता की जिन्दगी में भी प्रस्फुटित होता है।

अन्विता के मन की क्यारी में क्या कुछ बदलाव और हलचल मचाता है प्रेम का यह बीज?…


गोधूलि बेला में अंधेरा पैर पसार रहा है। थकी हारी अन्विता आफिस से घर पहुंचती है।

बाहर टीप-टीप बारिश, ऊपर आकाश में बादलों का खे़मा, कानों में हल्की धीमी आवाज में ग़ज़ल सुनते सुनते :
कोई मुझको लौटा दो बचपन का सावन
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी °°°
अन्विता फ्रेश होकर एक मग काफी लिए बालकनी में बैठ जाती है।

लंबी चुप्पी साधे दूर सूदूर तक लाल, निस्तेज और नि:शब्द ढलते हुए सूरज को निहारना, दिन भर से थके हुए सूरज को महसूस करना, उससे दिनभर की कही, अनकही बातें साझा करना, अन्विता को संध्या अर्घ्य देने जैसा लगता है।
तभी ट्रीन ट्रीन की आवाज से अन्विता का अवचेतन मन भंग होता है।

मोबाईल के आवाज पर खींज जाती है। इधर संध्या निशा को निमंत्रण देकर जा चुकी होती है।

अन्विता बालकनी से उठ घर के अंदर आते हुए दरवाज़े को उढ़का देती है।
उफ्फ्… दिनभर के मेसेजेस् और सोशल मीडिया की तफ़री यह भी जिन्दगी में एक जरूरी सा हिस्सा हो गए हैं। देखूंँ अब इस अलीबाबा के खजाने में क्या आया है।
हहहह … फेसबुक पर एक फ्रेंड रिक्वेस्ट भी है।
उहं…कौन है? चेक करने अन्विता उसके प्रोफ़ाइल के अंदर पड़ताल करती है। कोई जान पहचान वाली नहीं थी। बस कुछ काॅमन, म्यूचुअल फ्रेंड्स उसके और मेरे थे।
हम्म्…
एक्सेप्ट करने से पहले उसके फ्रेंड लिस्ट स्क्राॅल कर लूँ।

स्क्रॉल करते करते अन्विता अचानक एक फोटो पर आकर अटक जाती है।

आँखे फटी की फटी।

बंद पड़े होंठ बड़बड़ाने लगते हैं।

एकदम से थकान गायब।

ऐसा लगा मानो थकान जिस अंतरिक्ष से आया था वहीं चला गया या फिर जैसे गधे के सिर से सिंग गायब।
झटपट अन्विता अपने सिर के ऊपर चढ़े चश्मा को आँखो पर लगाती है।
हाँ अब साफ है।
हें! सुदीप? घोर आश्चर्य!
नहीं नहीं।
एक नाम के कितने लोग हैं।
अचानक यह नाम देखकर अन्विता का दिमाग कौंध गया।
न चाहते हुए भी तर्जनी उठती है और उस जाना पहचाना लेकिन अनजाना सा प्रोफ़ाइल पर क्लिक करती है।
नाम और चेहरा क्यों जाना पहचाना है?

क्या वही है?

लेकिन इतना मोटा?

चश्मा भी?

पेट और गाल गुब्बारे की तरह।

पूरा आदमी।
अचानक इतना बदलाव सहजता से पचा पाना मुश्किल हो रहा है। सैकड़ों सवालों से तर-बतर हो जाती है अन्विता।
नहीं नहीं! वह नहीं हो सकता है…
बावजूद स्वभाव और उसूल के खिलाफ अन्विता अनेकों बार प्रोफाइल पिक को ज़ूम करके देखती है।
वह तो बहुत ही दुबला पतला लहराता हुआ सा हुआ करता था। चाल ऐसे मानो चार डेग में दुनिया ही नाप लें।

अन्विता बीते समय के वर्तुल में घूमने लगती है।
शायद कोई बीस बाईस साल पीछे।

एक एक करके सारे दृश्य आँखों के सामने आईने की तरह साफ दिखाई देने लगते हैं।
हम्म्… सुदीप।

जिसको देख मैं डरती।

राह चलते दिख जाए तो नज़रें झुका अपना रास्ता बदल लेने की सोचती थी। क्यों ?
सबसे उसकी बोलचाल थी।

वह तो राह चलते गाँव बसा लेने वालों में से एक था।

सबसे बड़ी टीआरपी तो उसकी, उसका मुंह फट वाला स्वाभाव। कब क्या बोल दे पता नहीं।

अपने टेढ़ी कड़वी जुबान के लिए पूरे मोहल्ले में मशहूर।

ऐसे में कौन लड़की उसकी तरफ देखें और उसकी कड़वी बातें सुनकर अपना दिन खराब करें।

मेरा तो सवाल ही नहीं क्योंकि इन सब खूबियों के अलावा वह उम्र में वह मुझसे कोई शायद ६-७ साल या और भी बड़ा था।

तो किसी भी तरह से दूर दूर तक प्यार और दोस्ती जैसा कोई मामला नहीं था।
लेकिन एक दिन जो हुआ वह मेरे लिए किसी दिवा स्वप्न से कम नहीं था।

एक बात और भी कि जो हुआ उससे यह तो पता चल गया था कि जो बाहर से बहुत खड़ूस और कठोर होते हैं, वह अंदर से कोमल भी हो सकते हैं।

उनमें हम आम मनुष्यों की तरह भावनाएँ भी होती हैं

इनके पाषाण हृदय में प्यार जैसे शब्दों के लहरें हिलोरें भी मारती हैं।
अन्विता ख्यालों से बाहर आती है।
ओफ्फ्!

अजीब कशमकश है।

सिर्फ एक क्लिक की दूरी पर ही तो है।

दिल कह रहा था चल अन्विता मेसेज कर दूँ।
दिमाग कहता था कि न अन्विता इतने वर्षों बाद कौन किसे याद रखता है।

अगर पलट कर कुछ उटपटांँग जवाब दे दिया तो तू तो कहीं की नहीं रहेगी। अरे भई तुम्हारा भी कुछ आत्मसम्मान है। ।
करूंँ न करूंँ ….?

कैसी विडम्बना है।

पहली बार ऐसी स्थिति से जूझ रही हूँ।
लेकिन दिल डर के ऊपर हावी हो गया।

अन्विता बड़बड़ाती है…क्यों हूँ मैं इतने उहापोह में।
फिर अन्विता से रहा नहीं गया और मेसेज करने की ठान लेती है। एक गहरी साँस भरती है…
हेलो! सुदीप जी। कैसे हैं?

बहुत वेट पूट आॅन कर लिया है आपने। मैं कौन हूंँ? क्या आप मुझे पहचाने?
होफ्फ्… मेसेज सेंड…
लंबी साँस भरते हुए अन्विता कुछ हल्का महसूस करती है।

मिनट, घंटे,दिन बीतते जाते हैं।

हर पल अन्विता जवाब का इंतजार करती। कोई जवाब नहीं वहाँ से।

ओह हो सकता है यह वह सुदीप ही नहीं हो।
फिर काम और आॅफिस के चक्कर में इस कदर उलझ जाती है कि दिमाग से यह मेसेज वाली बात धुंधलकी होती चली जाती है।
एक रविवार को तेज बारिश थोड़ी सी फुर्सत में बैठी अन्विता सोचती है चलो थोड़ा सा मोबाइल खंगाल लूँ।

याद आया कि अरे, वह सुदीप नाम के एक महाशय को मैंने कुछ लिखा था। आज तक जवाब नहीं आया।

अच्छा रहेगा कि डिलीट कर दूँ। तर्जनी मेसेंजर पर दस्तक देती है।
बहुत सारे पेंडिंग मेसेजेस।

अन्विता को ऐसे भी सोशल साइट्स से लगाव न के बराबर है।
आज उसकी आँखें वहाँ सिर्फ किसी वजह से, कुछ ढुंढने गई थी। स्क्रोल करते करते एक मेसेज पर आकर ठहर जाती है। एक लंबे अंतराल के बाद शायद आज जवाब आ गया था वहाँ से।

अनरीड मेसेजेस में एक सुदीप का भी दिख रहा था। अन्विता हड़बड़ा सी जाती है।
अंदर से कंपन और कौतूहल दोनों आज अन्विता का साथ देने की कसम खाए एक साथ थे।
तर्जनी उठती है और साँस रोके अन्विता सुदीप के मेसेज को पढ़ने क्लिक करती है।

एक साँस में धड़ाधड़ पढ़ जाती है।
….अरे हाँ हाँ तुम्हें कैसे भूल सकता हूँ मैं।
तुम तो मेरी ज़िन्दगी की पहली और अंतिम लड़की थी।
बहुत ढूंढा इन बीस सालों में तुम्हें कसम से।
तुम्हारे किसी करीबी से पूछने की हिम्मत मुझमें नहीं थी कि कोई अन्यथा न लें ले इस पूछताछ को।
कैसी हो, कहाँ हो आजकल?
अन्विता लंबी साँस लेती है।

पास रखे पानी ग्लास को उठाती है।

गटागट पी जाती है।

ऐसा लग रहा था कि सुदीप सामने खड़ा हो।

सचमुच दुनिया गोल है।

किसी न किसी मोड़ पर मिलोगी सोचता था।

आज यकीन भी हो गया।

अन्विता कुछ देर आंखें बंद कर मन को एकाग्र करने की कोशिश करती है।
सुदीप ही है। यह तो कन्फर्म हो गया।
जवाब दूँ नहीं दूँ।

फिर से उहापोह वाली स्थिति में आ गई थी अन्विता।
दूसरे दिन सुदीप के सुप्रभात मेसेज से अन्विता का ध्यान
खींचता है।

मन ही मन सोचती है … जवाब तो देना बनता है।

क्योंकि वह नहीं, मैं ही गई थी उससे बात करने। इतनी तो नैतिकता होनी ही चाहिए।
अच्छी हूँ सुदीप जी।
सुदीप: आप तो मुझे भूल ही गई होंगी न?
अरे नहीं नहीं। भूलती तो मेसेज थोड़े करती।
सुदीप: हम्म्। इन बीस सालों में कितना ढूंढ़ा तुम्हें।

हर बार निराशा हुई।

इच्छाएंँ, आकांक्षाएंँ पृष्ठभूमि में कहीं दब कर रह गई।
हाँ मैं सोशल साइट्स में नहीं थी।
सुदीप: यह मेरा नम्बर है।

बात या व्हाट्सएप कर सकती हो मुझे।
अन्विता बात बदलने की कोशिश करती है।

सोचती है अब क्या बात करने को रह गया है। जो बीत गई सो बात गई।
अच्छा सुदीप कल बात करती हूँ।


क्यों क्या हुआ। क्या कह दिया मैंने।
नहीं नहीं सुदीप ऐसा कुछ नहीं।

बस साँस तेज हो रही है।
सुदीप: क्यों?
चलो अपना नम्बर दो।

मैं कोई परेशान नहीं करूंगा।
तुम नहीं कहोगी तो, कभी बात भी नहीं करूंगा।
जानती हो तुम मुझे अच्छी तरह से। जुबान का कितना पक्का हूँ…
इधर दिल, दिमाग, धड़कन सभी जगह अशान्ति ने धावा बोल दिया था।

बावजूद अन्विता बिल्कुल शांत रहने की अथक कोशिश करती है।
सुदीप : अब बोलोगी कुछ? नम्बर दो!
अन्विता यंत्रवत सी नम्बर शेयर करती है साथ में चेतावनी कि यह नम्बर सार्वजनिक नहीं है।

सिर्फ कुछ खास और परिवार वालों के लिए है तो किसी से साझा नहीं करोगे।
सुदीप : तुम तब भी मेरी पर्सनल थी और आज भी उतनी ही पर्सनल हो।
अन्विता : चुप करो।
सुदीप: चुप तो कर लूँ।

अंदर इतना घमासान मचा हुआ है उसे कैसे चुप कराऊँ?

झूठा सच तो नहीं यह सुदीप ?

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ाम ही तो है
दुश्नाम तो नहीं है ये इकराम ही तो है °°°
दिल ना उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लंबी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है °°°

अहमद फ़ैज़ की यह लाइन रेख़्ता पर पढ़ते हुए अन्विता के आँखों के सामने सुदीप है और कानों में उसकी आवाज घुल रही थी साथ में एक तीखी बेचैनी।

मानो यह शेर सुदीप मेरे लिए कह रहा है।
इतने सालो बाद मिली हो।

तुम्हें क्या पता मैं कितना खुश हूँ।

अच्छा चलो आज के लिए इतना ही।

अब इति करता हूँ।

कॉल करूंगा।

बॉय।
अन्विता: बॉय।
अन्विता का सर भारी होने लगा। लग रहा था जैसे दिमाग को सुदीप ने जकड़ लिया था।

क्रमशः °°°
-अपर्णा विश्वनाथ

अमलतास

चुभती धूप/तपती सड़कों पर/
सरपट भागते हुए लोग है
लेकिन एक मोड़ पर
उस पीले झूमर तले/उससे टपकते चटकीले पीले रंग से/पीताम्बरा की मौजूदगी से/
सदियों से बेज़ार एक घर/कुछ खंभे/और लाल दिवारें/
आज गुलज़ार है/
अहा! पीताम्बरा
गोया,
सूरज ने/अपना पूरा पीला रंग/तुम पर ही उड़ेल दिया है/

बेसाख्त ठहर जाती हूँ…
न न ठंडी छांव के लिए नहीं/
बस कुछ सुस्त लम्हों को ढूंढने/ कुछ रुका हुआ दर्द बताने ,
लेकिन
मेरी मौजूदगी की/इसे क्या ख़बर /
औचक, टहनियों से/बेशुमार फूलों की पंखुड़ियांँ छलक/
कुछ हथेलियों पर/और कुछ कानों पर आकर/
क्यों, फासलों में भी तो जिन्दगी है/
कहते हुए ठहर से जाते हैं।

-अपर्णा विश्वनाथ

स्मृति

सुनो !
स्मृतियों की यह जो
आभासी अंकगणित
है ना,
है तो थोड़ी सी
अज़ीब
कभी घटती
तो कभी बढ़ती •••


संघटन विघटन
का यह सिलसिला
छिड़क सा जाता है

मानो

फिर एकबार
हरा-गुलाबी रंग

और लहलहा उठता है
फिर से
ऊसर मन •••

तब, शून्यता से

कोसों दूर,

जड़
चेतन में तब्दील होकर


गमन करने लगती
साँसों की
वक्र रेखा में •••


और हाँ सुनो !
जिस दिन
जाएंगी शुन्य
वह स्मृतियाँ न
उस दिन जाएगी
तब्दील वह
तेढीमेढी़ वक्र रेखा
एक सरल सीधी रेखा में •••

-अपर्णा विश्वनाथ

#पतझड़

सुनो !
देखा है हमने
ज़मीन, मिट्टी,
दरख़्त और
पत्तों को,
सभी तो वफादार हैं •••
हाँ !
मिट्टी गिरने नहीं देती
दरख़्त को
रखती,
जड़ों को कैद कर,
देती दरख़्त को
एक सहारा और
आकाश भर यकीन
अपने उस कैद-ओ-बन्धन में भी•••
देखो न !
पतझड़ में
शाख से बिछड़े
उन पत्तों को
वह भी तो वफादार है
अदा कर देते हैं
मिट्टी के नमी का क़र्ज
जिस मिट्टी से जन्मते हैं
जाते हवाले उसी मिट्टी के •••
सुनो न !
उन बूंदों को भी
बैठी
पत्तों के पीठ को
सहलाती
कह रहीं हों जैसे •••
हाँ !
पत्तों का सूखना,
गिरना और बिखरना
एक तैयारी है,
एक जश्न है
उनका सूखना,गिरना और
बिखरना भी,
गौरवशाली है कितना •••

-अपर्णा विश्वनाथ