की अकेला बैठता हूँ मैं,
की अकेला बैठता हूँ मैं,
तो एहसास होता है,
की जैसे बरसों का दुख हो टूटा मुझ पे,
की दर्द की पराकाष्ठा क्या है,
की जैसे घिसते हुए किसी पहाड़ से गिर रहे हो आप,
और कोई भी सहारा ना मिले,
सोचो तो कुछ नहीं,
सोचो तो बहुत कुछ,
की अकेला बैठता हूँ मैं,
तो डरता हूँ,
समझ पाएगा क्या कोई भी,
की भूल गए सब शायद की हूँ इंसान मैं भी,
की खींचती हैं अंतड़ियाँ अंदर से बाहर,
ख़ौफ़ से आँखें नहीं बंद होती,
नींद दूर सी भागती है,
या मैं हूँ जो सोना नहीं चाहता,
की अकेला ही बैठता हूँ मैं,
की करे क्या इस्नान ही,
सब कैसे ठीक होता है,
वक्त कैसे सारे ज़ख़्म भरता है,
कोन बताएगा,
कोन ढाँढस बँधाएगा,
की अंजाबी सी शक्ल है आईने में मेरी,
समझता हूँ ख़ुद को,
बस एक दिन और,
एक दिन और,
एक दिन और……








