God, Ishaisms, poem

हर हार हरि का द्वार

अब और क्या आंसू बहाऊं, अब और किसे पुकारूं...जब सब मुखौटे ही रण पर गिर पड़े, और मैं, शहीदों की तरह जलते हुए अपनी ही चिता को राख में बदलते देख ना करु कुछ महसूस…सिवाए इस वायु के…सिवाए उस डमरू के…सिवाए तेरे शंखों की गूंज?