अहसास-ए-द़िल…..

तन्हा तन्हा दिन बीते…
लम़्हे-लम़्हे रात कटी…
किसी की म़य ने वर्ज़िश की…
खुद ग़म ने मेरी माल़िश की…
ना ज़ाने कौन कुन्दन सा दमका..
कौन फ़िर चन्दन सा महका…
ख़ुद मेरे द़िल ने द़िल से पूछा…
कि कहाँ से यह ख़ुश्बू सी महकी…
यूँ तप तप के सोना सा द़िल चमका..
इस लम़्हे श़ुक्रिया ख़ुदा का….
मुस़्तकब़िल का हाफ़िज भी वही..
जिसने मुझे परख़ा हरदम…
देके ठोकर हर बार मेरा अज़ीज वही..
स़ौगात-ए-ज़ख्म दे हर बार ऩुमाँ…
म़रहम बना च़ारागर हर बार वही…
हाँ,वो मेरा ख़ुदा ही था…
ख़ुद मेरी बेख़ुदी में रहा ब़िस्मिल…
ज़िन्दगी का है जो ज़ान-ए-नाख़ुदा…
अरूणा शर्मा-Sep.30;2024.6:24pm.




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