हक़ीकतन
हक़ीकत बयाँ हो रही है ह़क़ीकत से।।।
सभी गुनहग़ार है कुदरत के कत्ल के
ये हवाऐं यूँ ही जहरीली नहीं हुईं ।।।।
कहने को शहर में मेरे
सब अमन पसन्द लोग हैं,
आग यहाँ जल जल कर है बुझी हुई।।।
तुम मेरे शहर में आओ तो चुपके से आना
दीवार की इश्तहारों पे है आवाज दबी हुई।।।
कोई अरसा पहले गुम हुआ था यहीं
हर कूचा है हर निग़ाह में ज्यूं तलाश करती हुई।।।
हक़ीकतन हक़ीकतन हक़ीकत बयाँ होगी
यूँ ही सबकी अक़ीदत यहाँ अयाँ होगी।।।
क्या खोना सब खोने बाद, जी ज़नाब ,
यूँ इन्तजार-ए-उम्मीद कुछ पाने की कहाँ होगी।।।
मुश्तकिल मुस़्तकब़िल के रहो मुंतजिर की ज़ानिब
रूपपोशी में तो यार, होश परिन्दें सी रवाँ होगी।।।
Aruna Sharma.
28.08.2025
12:17am
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