Archive for ફેબ્રુવારી, 2012

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“मैं” (Mono-Image कविता)

18/02/2012

(१)
मुझको आपको
सबको
चिपकता रहता
“मैं”।

(२)
यह “मैं”
बडाबलवान….!
गिराता पल में।

(३)
शायद
इसी “मैं” ने
काबाओ के सामने
अर्जुन के धनुष्य को
निक्कमा किया होगा…!

(४)
“मैं” नाम के
दैत्य को
मारने के लिये
होगा कोई
युगावतार?

(५)
अब तो
कई जगह पर
“मैं” का स्थान
“तू” ने
ले लिया है।

(६)
क्या
“मैं” को पता है?
“मैं” का विरोधी
“मैं” ही है।

– ‘सागर’ रामोलिया

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નખ (મોનો-ઈમેજ કાવ્ય)

12/02/2012
(૧)

મારા આ નખ
વધતા જ જાય છે…
શું મારામાં
કોઈ રાક્ષસ તો
નથી પેસી
ગયોને?
(૨)
કરે આંગળાનું
રક્ષણ,
તોય ગાળ ખાય ઃ
‘આંગળાથી નખ વેગળા.’
(૩)
ભલે ન ગમતા હોય,
પણ નખ તો છે
અલ્લડ કિશોરીનું
ઘરેણું!
(૪)
નખને સજાવશો તો
દુલ્હન બનશે
અને
જો બનાવશો
ધારદાર તો
ખૂની બનશે….

– ‘સાગર’ રામોલિયા

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ग़म

05/02/2012

(१)
आज हम चाहे तो भी ग़म न मिले,
ग़म बढ़ानेवाली रहम न मिले।
बिना घाव के भी दर्द बढ़ाता चले,
ऐसा कोई भी हमें ज़खम न मिले।
(२)
ग़म मिले तो ग़म का ख़याल न आये,
ग़म न सह पाये ऐसा काल न आये।
‘सागर’ तैर जाये पकडके तिनका,
मझ़धार में रहे ऐसा हाल न आये।

– ‘सागर’ रामोलिया

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