आजादी के नव भोर में हम सब,
याद करें उन वीरों को,
कर दिया समर्पित सर्वस्व जिन्होंने,
भारत माँ की आजादी को,
आओ मिलकर नमन करे हम,
उन इंक़लाब के दीवानों को..
रहा सालों से जो गुलाम भारत,
सर्वप्रथम, सन् सत्तावन में गरजा था,
फूट पड़ी तब अंग्रेजों में,
जब मंगल पाण्डेय बरसा था,
अंग्रेजों से लोहा लेने को आतुर,
तब कई रियासतें रण में था..
आजादी के नवभोर में हम सब,
याद करे उस मंजर को,
जब ८२ वर्ष के वीर कुंवर ने,
ललकारा था अंग्रेजों को,
आओ मिलकर नमन करें हम,
सत्तावन के वीरों को..
स्तब्ध हुआ था विश्वजगत जब,
एक रानी ने तलवार उठाया था,
कहते है रक्तरंजित इतिहास के पन्ने,
उसने अंग्रेजों को लोहे के चने चबवाया था.
भारी थी सौ सौ पर वह एक अकेली,
अंग्रेजों में झाँसी की रानी का दहशत छाया था..
निश्चय ही वह क्षण गौरव के थे,
एक बेटी ने माँ का मान बढ़ाया था,
जननी जन्मभूमि की रक्षा की खातिर,
उसने सर्वस्व लुटाया था...
चुक गए तब भारतवासी,
नाना-तांत्या-बख्त का जो न साथ दिया,
अलग अलग कुछ खूब लड़े,
पर प्रयास न संयुक्त हुआ,
ख़त्म हो गया कंपनी-राज,
पर देश अब भी अंग्रेजों का गुलाम रहा..
आजादी के इस भोर में हम सब,
समझे उस गुलामी की पीड़ा को,
भूख अशिक्षा से त्रस्त वो भारत,
मान बैठा था किस्मत गुलामी को,
ख़त्म हो रही थी हर रोज उम्मीदें,
तब भारत लड़ने लगा बस रोटी को..
दिन थे बड़े कष्टमय तब जब,
भारतवंशियों ने सब अधिकार गंवाया था,
अंगेजों के चालों में फंसकर,
हीनता के भ्रम में खुद को उलझाया था,
थे वह निश्चय ही शर्म के दिन,
जब अश्तित्व की रक्षा को पहचान मिटाना था..
आजादी के नव भोर में हम सब,
याद करें उन उम्मीदों को,
कर दिया अचम्भित विश्वजगत को,
अपने ज्ञान के बोलों से,
आओ फिर से मनन करें हम,
शिकागो सम्मेलन के मंतव्यों पर..
कट्टरता के मार्ग पे था जब जग,
उसने सहनशीलता का अर्थ समझाया था,
क्या होता है वसुधैव कुटुम्बकम,
स्वामी ने दुनिया को समझाया था.
हुआ प्रफुल्लित भारत का जन-जन,
जग में भारतीय संस्कृति का परचम लहराया था..
मान बढ़ाया कई और संतों ने,
और समाज सुधार का सफल प्रयास किया,
निकले भारत कुप्रथाओं से आगे,
इसलिए मोहन, इश्वर, दयानन्द का अभियान जरुरी था..
आजादी के नव भोर में हम सब,
याद करें उन असीम कोशिशों को,
राष्ट्र हो गया एकजुट तब जब,
शुरू हुआ मुहीम स्वदेशी को.
आओ मिलकर नमन करें हम,
लाल-बाल-पल की कर्मठता को.
To be continued…
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