आफ्टर डेथ पालिसी

​जब जिंदगी लाख रूपये में किराए पे लगती हो,
तब मौत को कर के करोड़ों का इसका भाव क्यों बढाया है?

कभी गजेंद्र तो कभी गरेवाल अब तो आत्महत्या के बाद भी करोड़ों अनुदान के नाम पर मिलता है पर क्या हम पूछ सकते है कि जिस देश में हजारों किसान हर रोज हार रहे है, बॉर्डर पर हर रोज शहादत होती है, सड़क दुर्घटना, ट्रेन दुर्घटना, जैसी कई और आकस्मिक मौंतें जिनमे नेताओं का अनुदान घोषणा का रिवाज है में कबतक और कितना रुपया खर्चा जायेगा? ये रूपये किस मद से आते है क्योंकि इन पैसो का कोई जिक्र आम बजट में तो होता नहीं। वैसे क्या ये आफ्टर डेथ पॉलिसी बदली नहीं जा सकती? क्या जिंदगी को लेकर भी कुछ नहीं सोंचा जाना चाहिए? सैनिक कम शहीद हो, हर नागरिक देश में खुश रहे, सुसाइड रेड, एक्सीडेंट रेट कम हो इस पर विचार नहीं होना चाहिए? अनुदान/सब्सिडी से आगे बढ़कर अब प्रोत्साहन और सम्मान की ओर कदम नहीं बढ़ाना चाहिए?

-सन्नी
रेस्ट इन पीस इंडियन पॉलिटिक्स फॉर योर आफ्टर डेथ पॉलिसीस

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