
ये सुनसान गलियां और रातें
बताओ यहाँ तुम्हारा कौन है
किसकी तलाश में भटक रहे हो
हर दम बेफ़िक्र, बेख़बर हो कर केमिलो कभी खुद से
ज़माने में रखा क्या है
तज़ुर्बे की बात करो अपनी
यहाँ गलियों में भटक कर किसी को मिला क्या हैकहानियाँ बनाओ खुद की
इतिहास के पन्नों में तो बस कुछ ही नाम हैं
ठोकरे सभी ने खाई है अपने हिस्से की
बस अब आने वाले कल में एक तुम्हारा नाम हैमाना ख्वाइशें तुम्हारी आज भी क़ैद हैं
पर छुपाओ न खुद से खुद ही को
बहाने तो बना लिए लाखों आज तुमने
अब आने वाले कल का भी क्या वही हश्र है?©weekendpoetry












