
घर से दूर मैं मजबूर
आबोदाना तलाश रहा
राहों में भटक रहा
अपने मंजिल को तलाश रहा ।।
कुछ सुखियाँ है आजादी का
कुछ ग़म है अपनो से बिछड़ने का
परिंदा पर फड़फड़ा रहा था बहोत
दूर निकल गया…मग़र
ग़म है अपने आशियाने से बिछड़ने का ।।

घर से दूर मैं मजबूर
आबोदाना तलाश रहा
राहों में भटक रहा
अपने मंजिल को तलाश रहा ।।
कुछ सुखियाँ है आजादी का
कुछ ग़म है अपनो से बिछड़ने का
परिंदा पर फड़फड़ा रहा था बहोत
दूर निकल गया…मग़र
ग़म है अपने आशियाने से बिछड़ने का ।।

निर्मल मन जन सो मोहि पावा
मोहिं कपट छल छिद्र न भावा ।।
मैं इश्क़ हूँ
मुझे पढ़ ले, अगर, समझ पायेगा तू
नहीं तो तबाह हो जाएगा तू
बहोत फिरते है मेरे अंजुमन में, दीवाने
संभल, न डूब पायेगा तू न तैर पायेगा तू ।।

ये राजनीति धर्म की है
या धर्म की है राजनीति
कोई बोल दो
ये सैनिक ये शहीद देश के लिए है
या धर्म के लिए
कोई बोल दो ।1।
ये आजादी देश के लिए है
या धर्म के लिए
कोई बोल दो
ये आजादी उच्य वर्ग के लिए है
या जनता के लिए
कोई बोल दो
ये आरक्षण देश के लिए है
या राजनीति के लिए
कोई बोल दो ।2।
राजनीति में लिप्त
है प्रमुख यहाँ
स्वर्थ में लिप्त
है जनता यहाँ
आतंक में लिप्त
है धर्म यहाँ ।3।
राष्ट्र भक्ति नहीं रहा
है धोखेबाज , है गद्दार हृदय यहाँ
कुछ तो शर्म करो
देश वासी मेरे
कुछ उच्च, है बहोत निम्न यहाँ
तुझमें मुझमें, है भेद बहोत
हर दिलों में, है दरार यहाँ ।4।
क्यों मिल एक हो नहीं सकते
जब आज़ादी के लिए हम
साथ हुए थे एक यहाँ
ये आतंक ये नफरत ये भेद कब तक
एक हो धर्म मेरा एक हो धर्म तेरा
एक हो स्वाभिमान एक हो अभिमान
ऐसा हो तेरा मेरा देश यहाँ ।5।

जिंदगी में कुछ लोग
है परछाई की तरहा
साथ रहते है…
पर साथ नहीं रहते है ।1।
धूप में भी मेरे पीछे
अंधेरों में गुम हो जाते है
ये हाल तो अपनों का है
समय पर हाँथ छोड़ जाते है ।2।
दिल भी ऐसा ही है, है मेरा
पर, दे किसी और को जाते है
कोई तोड़ते है कोई बिखरते है
कोई संजो रख जाते है ।3।
” जैसे के… तुम !”
शब्द मेरे तीखे है
आसमान में चीखे है
नयन घन घन बरस रही
मेघ मल्हार छलक रही
वेदना करुणा के भाव
लहरों में भटक रही ।।

पहले जैसे मासूमियत
वो समर्पण
अब नहीं है मुझमें
दाँत से काँट
गोली बाँट
खाया था हमने
अब समझदारी
का रोग लगा है
वो निःस्वार्थ हिस्सा
अब झूठा लगता है मुझे ।।1।।
अब आधा नहीं
पूरा हिस्सा
चाहिये जमीन का
बैठ कभी खाये थे संग
वो भाई की थाली
अब झूठी लगती है मुझे ।।2।।
न हदें न सरहदें
रिश्तों के बीच
न कोई लकीर थी
न पहले जैसे प्यार
वो विश्वास
अब, नहीं है मुझमें
दिलों में गाँठ
दिलों में फाँस
अब है अधिक
जब से रोग लग है
हर निश्छल प्रेम
अब झूठा लगता है मुझे
बंधन का रोक टोक
आकरण लगता है मुझे ।।3।।
बे वजह बात बढ़ जाती है
दयार दयार फ़ैल जाती है
कमबख्त इश्क़ न हुआ, नुमाया है कोई
हर नज़र चुभ जाती है ।।
किसी को धरती से प्यार नहीं
इस वसुंधरा से प्यार नहीं
मनुष्य को मनुष्य से, कोई सरोकार नहीं
बस, सब अपना स्वार्थ चीखे है ।1।
धरती छेद रहे, वृक्ष कट रहे
मनुष्य अपना आशियाना बन रहा
जीव जंतु तिलतिल हो रहे
परिंदों के आशियाना उजाड़ रहा ।2।
नज़र तलाश रही एक एक बूंद को
गला तरस रही एक एक घुट को
धरती फट रही, वेदना बादल बरसते नहीं
मेघ काले तो है
लेकिन… न वृक्ष है, न पानी है
प्रदूषण के कारण ठहरते नहीं ।3।
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मैं रहूँ ना रहूँ मेरे अल्फ़ाज़ जाविदां हैं, कल मिलू ना मिलू यह अंदाज़ अलहदा है...
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