की मैं मोहब्बत हूँ …

मेरे रक़ीब को खबर कर दो… की मैं जिंदा हूँ
उसे ये भी खबर कर दो… की मैं मोहब्बत हूँ ।।

तू कोशिशें बार बार कर… मुझे क़त्ल करने की
किस्से मेरे ही दोहराएंगे ये जमाना… की मैं मोहब्बत हूँ ।।

हर सख्स ने है गुनाह किया… मुझसे मिलने के बाद
वो चुनवा दिये दीवारों पर… की मैं मोहब्बत हूँ ।।

यज्ञ कोई उम्मीद की दहलीज नहीं… इस शहर में
चल कहीं दूर चल… की मैं मोहब्बत हूँ ।।

यारा तेरी यारी

यारा तेरी यारी
कैसे छोड़ दें
कैसे भुला दें
लड़कपन के खेल में
किशोर के उन्माद में
झूठ में सच में
धूप और छाओं में
चाहे बेवफा इश्क़ के चोट में
तेरा संग संग चलना
यारा तेरी यारी
है हमे जान से प्यारी ।।

खामी… बुराई

p3बुराईयाँ तो है बहोत, है उस सख्स में
मग़र… दब गये सब, उसे एक खूबी जज्बा ऐ हिंद से ।।
यूं तो बातें सुनने थे, सुन रहे है
पहले और अब के, हुक्मरान के
जाने क्यों अब , एक उम्मीद हुआ
होने नहीं देगा टुकड़े, फिर हिंदुस्तान के ।।
#यज्ञ

रंज / रोष / क्रोध / गुस्सा / Anger

लोग बदल जाते है
तेरे बदल जाने के बाद
रंज किससे करूँ
जिंदगी तुझसे या वक़्त से
तेरे बदल जाने के बाद |1|

यूँ तो…
विश्वास दिला जाते है
पर्वत झुका देंगे
देख कर झोके हवाओं का
पीछे हो जाते है
तेरे बदल जाने के बाद |2|

जिंदगी ने…
बहोत दर्द दिए है
पर ये चोंट न भरा
तेरे बदल जाने के बाद |3|

मेरे हुक्मरान बड़े मस्त है…

मेरे हुक्मरान बड़े मस्त है
और हम यहाँ त्रस्त है
बदलती रही दौर दुनिया का
तुम अपने में हम अपने में मस्त है
पर कभी कभी चुभ जाता है हमे
क्यों देश नेताओं से त्रस्त है
पर हम क्या करते है… चुनते है
नेता फिर चुनते है… सेवक नहीं
सेवक नहीं… आका बन बैठते है
और फिर…
हम त्रस्त है … वो मस्त है ।।

To be continue … part 2

निशां … / अस्तित्व… / Existence…

ashes_stock_6_by_birdsistersstockअब गुज़ारिश है ये जो खाक बची है मेरे फ़ना होने के बाद
फूँक मार, हवा में मिला, ये भी निशां मिटा दो, मेरा जाने के बाद ||

मौजूदगी मेरा तुम्हे खलल डालती है… तो
हमें कबुल है , ये भी निशां मिटा दो, मेरा जाने के बाद || #यज्ञ

नौकरी

कुछ तख़लीफ़ हमे हुआ कुछ तख़लीफ़ उन्हें हुआ
नौकरी तेरे सोहबत में है तख़लीफ़ , माँ को भी बेटे को भी ||

दुनियाँ बसा लिया मैंने तुझसे बिछड़ कर… पर
घर आज भी सुना है ये दर्द , माँ को भी बेटे को भी ||

पेट भर तो जाती है औरों के परोसे से भी
मन तृप्त होता नहीं है ये तृष्णा , माँ को भी बेटे को भी ||

हवाऐं यूँ तो उड़ाती है बाल मेरे
इस लुफ्त की है खालिस , माँ तेरे हाँथ को भी मेरे सर को भी ||

धुआँ …

हर जगह धुँआ है
कहीं सिगरेट का
कहीं विकास दिखाती
कारखानों की चिमनियों का
कहीं तेज दौड़ती
मोटर गाड़ियों का
ये धुँआ प्रकृति को
हम मनुष्य ने दिये है
और आज हम
इन धुँओं से
पीछा छुड़वाना चाहते है
पर… पेड़ पौधे
लगाना नहीं चाहते है ।।