नया साल… New Year

वक़्त बढ़ता रहा और मैं घटता रहा
उम्र बढ़ती रही और जिंदगी घटती रही
हम हम थे तुम तुम थे
और दौर मोहब्बत की यूँही चलती रही ।।

वो बेजान से थे मगर
साँसों का आना जाना चलती रही
शायद वो अब भी है तलबगार तेरा
वो खुले नज़रों से इंतजार करती रही ।।

वो खता खता ही रही
मैं तन्हा तुम तन्हा और इश्क़ तन्हा ही रही
ऐसे ही तुम भी हम भी बदलते रहे
और यूँही आशिकी की दौर बदलती रही ।।

यूं ही जिंदगी के लुफ़्त उठाते रहे
हम कभी वो कभी वक़्त दांव चलती रही
बनते बिगड़ते रहे रिस्ते
और फासलें बढ़ती रही कभी घटती रही ।।

## Happy New Year ##

हिंदी नहीं…. Hindi nahi

न जाने क्यों हिंदी को अंग्रेजी के पोषक पहना रखा है मैंने
शब्द अक्षर अपना भूल कर अंग्रेजी के लपेट रखा है मैंने ।।

हिंदी की महत्ता अधिक है मेरे मन में
इसलिए दीवारों पर टांग रखा है मैंने ।।

हर प्रश्न का उत्तर हो सकता है हिंदी
किंतु वर्चस्व दिखाने को अपने जिभ्या पे अंग्रेजी रखा है मैंने ।।

हाव भाव हर तरहा से मैंने … किसी और को
दिखाया सुनाया और हिंदी को टांग रखा है मैंने ।।

कोई हिंदी के शब्द कह जाये… स्मृतिपटल में
प्रश्न चिन्ह बन जाता है ,क्योंकि… हिंदी को टांग रखा है मैंने ।।

फिर…
कुछ समय विचार करता हूँ
हिंदी पे मन केंद्रित करता हूँ
और कुछ दिनों पश्चात
अंग्रेजी मार्ग पे आ जाता हूँ
क्योंकि… नौकरी महत्वपूर्ण है
हिंदी नहीं…

कुछ समय विचार करता हूँ
हिंदी पे मन केंद्रित करता हूँ
और कुछ दिनों पश्चात
अंग्रेजी मार्ग पे आ जाता हूँ
क्योंकि… नौकरी महत्वपूर्ण है
हिंदी नहीं…

चलो तीर छोड़ते है …

चलो तीर छोड़ते है
लक्ष्य भेद गई तो… ठीक
नही तो
ये किसी की चाल है ।।

ये संग्राम है
हाँ, ये वही संग्राम है
जिस’में पौरुष कम
बुद्धि का अधिक काम है
चलो तीर छोड़ते है
लग गई तो ठीक
नही तो
किसी और का दुष्परिणाम है ।।

आओ फिर से दाना डालें
राशन बांटे बिजली बांटे
गर्मियों में कम्बल बांटे
हर आवश्यकताओं का
पर्चा बांटे
चलो एक तीर छोड़ते है
लग गई तो तृप्ति
नही तो
आपदाओं का विपदाओं का मार
जैसे ये किसी की चाल है ।।

अब शिक्षा स्थिति परस्थिति
समस्त विषयों पर तर्क होगा
जन जन के
मतों का चिंता होगा
चलो एक तीर छोड़ते है
लगा तो ठीक
नही तो
लोभ का स्वार्थ का
अपने ही हितों का
दुष्परिणाम है ।।

मैं कट रहा था …

मैं कट रहा था…
क्योंकि मैं सीधा खड़ा था
मैं कट रहा था…
क्योकि मैं सच कह रहा था
मैं कट रहा था…
क्योंकि, लोग झुठ पे जी रहे थे
वो झूठ का दावा चल रहा था
और लोग…
जान कर यकीन कर रहे थे
वो सब जी रहे थे और जी रहे है, जो
आढ़े टेढ़े अपना हाँथ पैर फैलाये थे
और जंगल में… बस
सीधे, पेड़ कट रहे थे ।।

क्षणिक और बरसों …

मृत्यु क्षणिक है
किन्तु जीवन है बरसों
उस क्षणिक अवस्था के बाद
के यात्री कमाने को लगे है बरसों ।।

विजय का उन्माद क्षणिक है
किन्तु पराजय का वेदना रहता है बरसों
उस क्षणिक अवस्था को
कमाने में लगे है बरसों ।।

रिस्ते हो या घागे तोड़ना क्षणिक है
किन्तु रिस्ते को जोडने को लगे है बरसों
उस क्षणिक अवस्था के बाद
गाँठ दिखे है बरसों ।।

जीवन में आनंद क्षणिक है
किन्तु जीवन में पीड़ा मिलते है बरसों
उस क्षणिक अवस्था को
कमाने को लगे है बरसों ।।

जीवित है… Live

यदा कदा स्वास लेते है
मेरे भीतर अवश्य कुछ तो जीवित है
जिया हिचकोले भी खाती है
अंतर्मन के भीतर कुछ तो जीवित है ।।

टूट तो गया है पर प्रतीत होता है
किसी कोने पे अब भी स्वप्न जीवित है
हार गया हूँ दांव, कृपाण फिर संभाला है
संभवतया, अंतर्मन का दुयुत भीतर जीवित है ।।

ठन गई है, लक्ष्य भेदूँगा एक ही बाण से
रक्तरंजित खड़ा हूँ विश्वास भीतर जीवित है
दृढ़ लड़ता रहूँगा , रक्त के प्रवाह तक
अंर्तमन के भीतर विजय अब भी जीवित है ।।

चेहरा बदलने लगा…

वक़्त बदलने लगा बर्फ पिघलने लगा
जिंदगी है… जिंदगी चेहरा बदलने लगा ।।

सिता रहा जिसे बुनता रहा
अब कमजोर हुई वो है ऐतबार
चोंट पर मुश्किल मोड़ पर
अब रिस्तों पे गाँठ पड़ने लगा ।।

मैं खमोश था आईने मुझे घूरते रहे
शायद मेरे अक्स बदलने लगा
जवाब मैं दे देता निशानी भी मेरे होने की
मग़र… सवाल मेरे अपने ही करने लगा ।।

डरता हूँ…

जाने मैं कैसी कैसी बातें करता हूँ
मेरे इस अल्फाज को रोका क्यों नहीं करता हूँ
ता उम्र गुजर जाने के बाद
अब खुद को महफूज नहीं हूँ कहता हूँ ।।

क्या ये महज सियासी चाल है
या दकियानूसी बातें करता हूँ
मिला मुझे प्रसिद्धि , सम्मान और प्यार
सब झूठ है ये साबित करना चाहता हूँ ।।

जन्म हुआ जिस माटी पर
उस पर सवाल करता हूँ
बार बार एक बात
अपने मतलब की बातें करता हूँ ।।

पर मुझे सोचना चाहिये
मुझे डरना चाहिये
मेरे हर अल्फाज से पहले
उसके अंजाम का सोचना चाहिये ।।

मुझे झूठे अल्फाज से बचना चाहिये
मुझे इस झुठ को रोकना चाहिये
मुझे इस झुठ से टकराना चाहिये
मुझे इस झुठ को सच दिखाना चाहिये ।।

इसलिए कभी सोचता भी हूँ
ये अल्फाज क्यों…
ये बर्ताव क्यों…
ये बदलाव क्यों… जब हम, एक है ।।

कहीं पे तो हम एक है
तिरंगे को तुम भी मैं भी सलाम करता हूँ
जाने मैं किस बात से डरता हूँ
अब टुकड़े होने से डरता हूँ ।।

हुनर… कौशल… Skill…

मेरे कदम भी हुनर रखते है,
जो चलते है तो निशां करते है
ये निशां है जरुर, आढी टेडी
पर … जमाने को दिशा दे सकते है ।।

फासला रख जलाने के हुनर रखते है
ये इश्क़ है फ़ना करने के हुनर रखते है
परख मत दफन हुये चुनवा दिये है कई
वो आज भी तौबा तौबा करते है ।।

तेरे इस गुमान को भी चूर कर सकते है
अकेला तन्हा भी हम सफर कर सकते है
मेरी कोशिशें तुझमें सुराख कर सकते है
मेरे कदम ऐ चट्टान तुझे पार कर सकते है ।।