तारीख… दिनाक… Date… 2

Part 1

तारीखों में सिमट गई है
आज तेरे मेरे फैसले
वक़्त सफर करती रही… और
तारीख पे तारीख बदलती रही ।।

क्या इतना पेचीदा है
फैसले …
क्या इतना सस्ता है… ईमान
की, सरे आम बोली चलती रही ।।

कठपुतली बन गई
आज इंसाफ
गुनाहगार है कटघरे पे
पर सच बदलती बिकती रही ।।

कायदे के दफे बढ़ते रहे
मुल्ज़िम को सरपस्ती मिलती रही
सच की पुकार दबती रही
उम्र बढ़ती रही जिंदगी घटती रही ।।

इंसाफ का दौर चलती रही
बाप से बेटे चलती रही
कौन मिट गया गरज है किसे
इंसाफ तारीख पे तारीख बदलती रही ।।

है खण्ड खण्ड व्याप्त जो…

है खण्ड खण्ड व्याप्त जो
है बलिष्ट अभिमान जो
है एकत्र एक दुयुत पर
है झुंड में जो डगर डगर
मेमनों में विख्यात है
सियार भी साथ है
लोमड़ियों से दांव है
अराजकता में सने हाँथ पांव है
फिर भी कोई डर नहीं
विजय पर कोई प्रश्न नहीं
ये शौर्य का डंकार है
ये जन की पुकार है
ये सिंह का हुंकार है
ये समय का प्रहार है
राजशाही विलुप्त हुई
ये तंत्र प्रजातंत्र है
लोमड़ी इतना भी विदुर नहीं
जो सिंह की चाल नाप ले
तू चीख पुकार कर
मैं चुलूँगा…
हम चलेंगे दहाड़ कर ।।

हिंद एक है …

कल हम बिखरे बिखरे थे
आज हम एक है
इन दहशतगर्दों के खिलाफ
आवाज एक है
तू ठहर ज़रा
वक़्त लगेगा
तू इंतजार कर
तुझे भी मिलेगा
नासुरे-जख़्म
आज हिन्द की
ख़्याल एक है
सवाल एक है
वार एक है
दर्द एक है
आवाम एक है
ये देश एक है
हिन्द एक है ।। # जय हिंद #

आगाज हो… जवाब हो…

अब आगाज हो
नई कल का शुरुवात हो
जवाब हो जवाब हो
मुह तोड़ जवाब हो ।।

धैर्य अब छूट रहा
रगों में रक्त फुट रहा
क्रोध एकत्र हो रहा
नेत्र भी अंगार बरस रहा ।।

शस्त्र मियान से निकलेंगे कब
प्राण शत्रु के छूटेगें कब
मृदंग और ताल को बजाओगे कब
काल के विक्राल को जगाओगे कब ।।

शंख फूक कर
प्राण फूक कर
चल गगन पे दहाड़ कर
चल अपने कृपाण निकाल कर ।।

वेदना का तांडव दिखाना होगा
प्रिय प्रियतम के वियोग को समझना होगा
सर्वस्य नाश होगा
हर रक्त का कर्ज देना होगा ।।

डिगा नहीं सकती
झुका नहीं सकती
घृणित कृत से
हिन्द को डरा नहीं सकती ।।

अब एक अवसर चाहिये
वीर को शौर्य चाहिये
उफनती नशों को अब
प्रतिशोध चाहिये ।।

केसरिया साफा पहना केसरिया जो जाऊँगा
या लपट तिरंगे में आऊँगा
शांति हरियाली के रंग खिल गये बहोत
अब शौर्य का परचम लहराऊँगा ।।

भस्म भभूति अंग लगाऊँगा
अंगार अभी और धधकाऊँगा
ये जलन ये तपन रहेगी जब तक तब तक
उन कायरों का शीश खंडित कर न आऊँगा ।।

अब टकरायेंगे चाहे शीशा पत्थर
चूर हो जायेंगे हर कंकड़ पत्थर
न चुनेंगे अब कंकड़ पत्थर
घुन चना पिसेगा हर पत्थर ।।

जय हिंद… वन्दे मातरम्

जड़ चेतन… जागृत करूँगा

गिर कर चिंटीओं के जैसे
बारंबार लगातार प्रयास करूँगा
मन में है पर्वत अराजकता का
अधर्म का उसे पार करूँगा ।।

है अडिग वो शिखर
किन्तु अटल नहीं
है मदमस्त अहंकार में
अभिमान में उसे चूर करूँगा ।।

हूँ छोटा सा प्रकाश पुंज
घनघोर अंधेरे में भी मार्ग करूँगा
पुष्प चुन लेना तुम सभी
कर्मवीर हूँ शूलों पे पग धरूँगा ।।

मन मलिन है स्वार्थ लोभ है
अभिषेक कर पवित्र करूँगा
असत्य के उन्माद को सत्य के बाण से
पराजय को परास्त करूँगा ।।

एक होते है अनेक यहाँ
उस असत्य को उस शीशमहल को विध्वंस करूँगा
बारंबार लगातार प्रयास करूँगा सुदृढ़ करूँगा
पुनः अपने जड़ चेतन को जागृत करूँगा ।।

नारी… स्त्री… Women… 2

Part 1

कसम से हर जुबाँ से दर्द मिला
कभी नज़रों से वो दर्द मिला
न जाने कब बदलेगा ये हालात
नारी होने का हर दर्द मिला ।1।

तुम हमारे हो हम तुम्हारे है
न जाने कैसे कैसे भ्रम मिला
लोग मोहब्बत में जिस्म नोच लिए
जब कभी मौका मिला ।2।

मेरे ममता से करुणा से
सींचने का सिला मिला
मेरे लड़खड़ाते कदम को
लात कोक पर मिला ।3।

ख्वाहिशें जिंदगी को
हर दम हकीकत ही मिला
कभी अपने कभी पराये से
धोखा ही धोखा मिला ।4।

दिखावे के प्यार
दिखावे का खुला आसमां मिला
जब भी उड़ना चाहा
मुझको मेरा हद मिला ।5।

खिलते रहे महकाते रहे
गैरों के आँगन को ऐसा नसीब मिला
गुलशन से जब भी इसका सिला मिला
काँटे ही काँटे दामन पे मिला ।6।

धोखा … Cheat … फरेब … Fraud …

है हर अक्स पे धोखा
मतलब ज़रा अपना देख
परख रहे है अपने यहाँ
संभल कर ज़रा आईने देख ।1।

न सता इश्क़ के दीवानों को
ज़रा उनके हालत तो देख
दर-बदर से फिर रहे है
मंदिर माज़िद चौबारे देख ।2।

हुई सल्तनत तबाह कितने
आस्तीनों पे अपने झांक के देख
ना तूने ना मैं भरोसा किया
हुये कितने टुकड़े आज देश देख ।3।

रकीबों से कोई गिला नहीं
हबीबों की चाल देख
ढा गये चट्टन भी यहाँ
सरपरस्त चूहों के सुराख देख ।4।

नारी… स्त्री… Women…

नारी की दशा बहोत ही विचित्र सी है
है देवी पर क्यों अपवित्र सी है ?
है हर जीवन का स्रोत… पर
जीते जी स्वयं मृत सी है ।1।

सुलझती है जीवन को
जो स्वयं ही उलझी सी है
नारी है हर आंगन के पुष्प
जो स्वयं काँटों से घेरी सी है ।2।

अदा उनमें बहोत है
पर कहीं तो दबी सी है
यूं तो गगन को चीर निकल सकते है
पर कुछ तो पर कटी सी है ।3।

Continue … Part 2

नारी… Women…

तेरा चित्रण कैसे करूँ
तेरा वर्ण गण का बखान कैसे करूँ
विधाता ने तुम्हें नारी रुप में गढ़ा है
उस विशेष चरित्र का बखान कैसे करूँ ।।

तुझमें ही तो बहती है
सृष्टि की ममता करुणा की धारा
प्रीतम की प्रियतमा हो तुम
तुम्हारी स्नेह का बखान कैसे करूँ ।।

नयन कटार भृगुटी विशाल
तेरे अनंत रूप का बखान कैसे करूँ
समय समय पर जब उठाई हो तुम तलवार
तेरे उस ओज का बखान कैसे करूँ ।।

चराचर सृष्टि तुम से ही चलती है
जन्म की स्थिति परिस्थित का बखान कैसे करूँ
नव जीवन के उस जोत को लेन को
तेरा वो बारम्बार मरे का बखान कैसे करूँ ।।

तुझ बिन ये सृष्टि यूं तो चल नहीं सकती
पर नारों के अभिमान को बखान कैसे करूँ
नर नारी पर निर्भर है फिर भी
तेरी दयनीय दशा का बखान कैसे करूँ ।।