
उम्र का कोई मेल नहीं
वो उम्र भी कितना अच्छा था
जब दादी नानी की
कहानी लुभाती थी ।।
वो दौर भी क्या खूब था
जब जुबान मीठी लगती थी ।।
बेवजह झगड़ा कर
कुछ पल में संग हो जाते थे ।।
बेवजह इसके उसके घर चले जाते थे
कुछ चीज को देख मन में
पाने की ज़िद हो आती थी ।।
समझ नहीं था तब…
पर अच्छा था
आज अपना पराया सब जान गये
हम से मैं होना को जान गये
तेरी मेरी की कहानी जान गये
मेल मिलाव अपने
हम उम्र से ही होता है अब
रोक टोक अब, दादी नानी की चुभती है
रंज दोस्तो का लंबा चलता है
और हाँ बेवजह अब
उसके घर जाना भी नहीं होता है
कुछ पाने की ज़िद को
टाल नहीं सकता कोई ।।
जाने के कैसा दौर है
जिसने दादी नानी की
कहानियों से दूर तो किया
और उनका जबान
कड़वी लगने लगी …
गर मैं समझदार हुआ
तो क्या फायदा
ना जाने कितने
बचपन की लुभानी
सुहानी कड़ियाँ
पीछे छूट गये ।।









