
दहलीज़ में तुम भी थे
दहलीज़ में हम भी थे
मग़र… ये फासला
फासला लम्बा था
दिल से दिल तक
तय करने को ।।

दहलीज़ में तुम भी थे
दहलीज़ में हम भी थे
मग़र… ये फासला
फासला लम्बा था
दिल से दिल तक
तय करने को ।।

सतरंगी यादें हैं
अतरंगी दोस्तों के
जो बात बात पर
जुबान से गाली छोड़ते थे
राह चलते चलते
हसीनाओं को
मेरे नाम कर देते थे
और दोस्त के सही
गलत से न था मतलब
उस पर मर मिटने को
तैयार रहते थे ।।

तुम तुम ही रहे
हम हम ही रहे
तेरे मेरे गुमां की
बस होती रही जीत
ये वक़्त तो बदलता रहा
एक हो कर हम
हम हो न सके
रंज तंज करते रहे
और बस … हम
हम लड़ते रहे ।।

वक़्त पे यहाँ वहाँ बस जगह पहुच जाता हूँ मग़र
एक तुझ तक पहुचने को अक्सर देर कर जाता हूँ।।
शाम रात क्या सुबह क्या दिन अब तो पलकों को
ख़्वाबों तक पहुचने में अक्सर देर कर जाता हूँ ।।
चलते फिरते ही रहता हूँ आगे ही आगे बढ़ते ही रहता हूँ
फिर भी न जाने क्यों मज़िल तक पहुचने में अक्सर देर कर जाता हूँ ।।

छोटी बड़ी अपनी
डायरियों को खोला
तो देखा कई अरमान
कागज़ के पुर्जों कि तरह
बिखरी हुई मिली
कुछ अधमरी सी
बेजान कटी फटी सी
पीले गुलाल पोते हुये
वक़्त की मार सहते
सारे लक्षण
विकार के दिखाते मिली ।1।
कुछ अपने
कुछ दोस्तों के
कई रहस्यों की
कहानी मिली
कुछ बात कुछ लोग
कुछ गिले शिकवे
भी बेतरती से बिखरे मिली
मन के करीब थे जो
वो अनकही बाते , गीत
जो , उनके लिए लिखे थे
कानों में कुछ
मद्धम कुछ तीव्रता से
पुकारते गुनगुनाते मिली ।2।
आज भी
साथ नहीं छूटा है
छोटी सी छोटी
बड़ी सी बड़ी
अपने जिंदगी के पलों
डायरियों में संजोता हूँ
की कोई तो इसे पढ़ ले
कोई तो मुझे समझ ले
पर , इस भाग दौड़
की ज़िंदगी में
वक़्त का उलाहना दे
पराये तो पराये
अपने भी करीब नहीं मिले
सिर्फ और सिर्फ
मतलब से लोगों को
करीब आते देखें
मुझे पढ़ने समझने
की बातें… बेमायने मिले ।3।

समय का भी अजब खेल है
नीति राजनीति का पेलम पेल है ।1।
कोई कर रहा खुर्सीयों का खींचतान
तो कहीं विचारों का मतभेदों का रेल है ।2।
कोई कर रहा जिंदगी को कुछ जीने को
तो कहीं ऑटो रिक्शा बस रेल का ठेलम ठेल है ।3।
अड़चन से धीरे धीरे जड़ तंतु कट रहे
दम घुटा तो जाना बिन वृक्षों के कहाँ वेल है ।4।

मैं कलमकार हूँ इसलिए नहीं लिखता हूँ
मैं लिखता हूँ इसलिए कलमकार लिखता हूँ ।।
मुझे चोट मिला है इसलिए नहीं लिखता
मुझे अनुभव है दर्द का इसलिए लिखता हूँ ।।
बात कड़वी है इसलिए नहीं लिखता
वो बात सच है इसलिए लिखता हूँ ।।
मैं दरिया से तैर निकला इसलिए नहीं लिखता
अब भी डूबा हूँ मैं इश्क़ में इसलिए लिखता हूँ ।।

पन्ने बिखर गये हैं
यादों के…
मेरे दरों-दीवार पे
नज़र आती है
तस्वीर हर
दरों-दीवार
मुझे पुकारती है
मुझे बुलाती है
शामों-सहर
ले के मेरा नाम
तेरा दूर जाना
मुझे करीब ला दिया
ये दरों-दीवार
करती है अब
मुझ’से लाखों सवाल ।।
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मैं रहूँ ना रहूँ मेरे अल्फ़ाज़ जाविदां हैं, कल मिलू ना मिलू यह अंदाज़ अलहदा है...
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