दवा चाहिए …

मेरे बेजुबाँ दिल को जबा चाहिए
मेरे जख्म-ए-दिल को दवा चाहिए ।।

कागजों की स्याही बन कर रह गई
मेरे दर्दे-दिल को कुछ और अदा चाहिए ।।

थम जाती है जिंदगी शाम हो जाने पर
अब यादों को भी तेरी हवा चाहिए ।।

चलो चलते है कहीं

चलो चलते है कहीं
जहाँ सच को
सच कहता हो कोई
तसर गये है अब कान मेरे
चलो चलते है कहीं
जहाँ सर उठा कर
सच कहता हो कोई ।।

सभी गुनगुनाते है यहाँ
अपने ही दर्द को
गैर का कौन सुनता है कोई
कंधा भी मिलता नहीं
जिससे थाम कर संभल जाऊँ
चलो चलते है कहीं
जहाँ बेमतलब भी मिलता है कोई ।।

मेरे मुताबिक कोई तो जहान मिले
जहाँ मुहब्बत को निभाता है कोई
हर नज़र मुझे अदू समझते है
चलो चलते है कहीं
जहाँ हबीब भी हो कोई ।।

यक़ीन की बात

खामोश हो कर की थी उसने सारी बात
मग़र दिल न समझ सका वो जज्बात ।।

खुशियाँ और ग़म को पढ़ना न सीखा
अब सबक में रह गई फ़क़्त अंको की बात ।।

तौलता रहा कम कभी ज्यादा पल पल
जब रिश्तों में नहीं था यकीन की बात ।।

इंसाफ चाहिए …

सच झूठ क्या है ये हमें न बतलाइए
अब मेरे दिल को जवाब चाहिए ।।
जुल्म नहीं सहना है अब हमें
गुनाहों का सिर्फ इंसाफ चाहिए ।।
हैवानियत और दरिन्दगी को अब
कुचलने को ठोस कदम चाहिए ।।
कब तक मानमर्दन होता रहेगा
ऐसों को दंड विधान कठोर चाहिए ।।
अंग भंग कर छोड़ो ऐसे रावणों को
तिलतिल रहे तिलतिल हो मरना चाहिए ।।