
यज्ञ क्या तुम अकेले हो, तन्हा हो
तो इक दीपक जला क्यों नहीं लेते
इस तीरगी से लड़ने के लिए
मन में रौशनी फ़ैला क्यों नहीं लेते
वक़्त एक सा नहीं रहता सदा
ये दिल को समझा क्यों नहीं लेते
कोई जी कर मोहब्बत करता है
कोई मोहब्बत कर के जीता है
ज़माने को ये फर्क़ दिखला क्यों नहीं देते
लड़ाई छिड़ी है मानवता के बीच
इंसाँ है तो इंसानियत निभा क्यों नहीं लेते ।।





