जीत मुझे मिले … राम

जन्म से इंसान कर्म से दैत्य हूँ राम
मेरे मन के रावण को मार दे राम ।।

दिशा दिखे न राह है जाना कहाँ राम
भट था हूँ जीवन को उद्देश्य दे राम ।।

मैं दीन तेरे चरणों का दर्श पाऊँ राम
के मेरे मन के पाप को मिटा दे राम ।।

अंधियारा मलिन मन को कैसे धोऊँ राम
मुझ पर कोई अग्निअस्त्र चला दे राम ।।

ऐसी हार का मैं बखान क्या करूँ राम
जीत मुझे मिले हार कर तुझसे राम ।।

मुनासिब नहीं …

बिकना मुनासिब नहीं
खरीदना मुनासिब नहीं
प्यार का सौदा तेरा यज्ञ
ये सही नहीं न वो सही नहीं ।।

दिल से दिल की बात होती है
जुबाँ से कहना मुनासिब नहीं
दूर से ताकते ही रहना यज्ञ
प्यार को पाना जरुरी नहीं ।।

झूठ के घरौंदे है रेत के
ऐसे आशियाँ ये ठीक नहीं
झूठ सच को पहचान यज्ञ
हर बात का सौदा ठीक नहीं ।।

क्यों नहीं करते …

बोलने कहने से पहले तौला क्यों नहीं करते
ख़बरों को यज्ञ तुम परखा क्यों नहीं करते ।।

कुछ यहाँ वहाँ कुछ दूर तलक ख़बर फ़ैली है
इस आग को संभाल परोसा क्यों नहीं करते ।।

तुम कठपुतली तो नहीं तुम अपने रास्ते चलो
राही हो राही का फर्ज़ निभाया क्यों नहीं करते ।।

बेतुके बातों ने आज क्यों शोर मचाया है
अपने कलम को समझया क्यों नहीं करते ।।

फूतुर्क बातें हैं क्यों आज सुर्खियों पर यज्ञ
आईना सच का दिखाया क्यों नहीं करते ।।