अब मुँह खोल …

तू भी अपना अब मुँह खोल
ग़ैरों सा कहो तंज के बोल ।।

इक तेरे ईमानदारी से क्या होगा
जब नित कर रहे है सब झोल ।।

बातें ऐसे वैसी हो रही है यारा
अब तो राज ए इश्क़ को खोल ।।

सच झूठ नहीं है यज्ञ बस ये तो
है अपने मतलब के ही बोल ।।

जाने क्यों ?

तुझमें भी हुनर है
मुझमें भी हुनर है
तुम अक्सर जीत जाते हो
मैं अक्सर हार जाता हूँ ।।

किस्मत की लकीरों में
क्या लिखा है, ये रब जाने
यूँ तो मैं, सब से जीता हूँ
बस तुमसे हार जाता हूँ ।।

ऐसे तो है सुलझे सुलझे
बस तुमसे मिल कर
मैं बहक जाता हूँ
उलझ जाता हूँ
जाने क्यों ? मैं
खुद से, ही हार जाता हूँ ।।

छोड़ दें …

2122 2122 212
ख़ौफ़ फ़ैला है तो जीना छोड़ दें
क्या वबा से डर के लड़ना छोड़ दें ।।

इश्क़ मेरी पहरे पे है दुनिया तो
चाहे के हम तुम यूँ मिलना छोड़ दें ।।

झूठी मोहब्बत थी उनका जाना तो
लगता है अब ये ज़माना छोड़ दें ।।

जो मिला है दर्द मोहब्बत में तो
यज्ञ क्या अब प्यार करना छोड़ दें ।।