
विध्युत विस्फोटित हो रहे है तन में
प्रेम का अबीर मल लिया है मन में
तन केसरिया मन केसरिया
छा गया है केसरिया जीवन में ।1।
कर दूँ खंड खंड हर दुःसाहस को
कर प्रबल वेग धमनी शिराओं को
बिखेर के गुलाल धरती अंबर में
प्यास तृप्त कर जाऊँ धरा को ।2।
फाग की मल्हार में
विलन हो स्नेह और प्यार में
न ललकार युद्ध के द्वार में
भय से कांप उठोगे
प्रचण्ड बिजली दमक उठेंगी
जब नरक के द्वार में ।3।
समझ वेदना बिछोह का
अपने प्राणप्रिये प्रीतम का
हो चाहे एकत्र अनेक
एक बाण की पर्याप्त है अर्जुन का
न जगाओ क्रोध की ज्वाला
सर्वष्य नाश हो जायेगा
त्रिनेत्र खुल जाये जो महाकाल का ।4।
मर्दन दमन नाश कर दूँ
उठे है जो अभिमान में
प्रेम का आलिंगन स्वीकार कर
नहीं तो खंडित कर दूँ
भुज उठे है जो अंहकार में ।5।
है जो उन्मदित उन्माद जो
मेरे प्रेम का देखेगा प्रहार जो
रंग गुलाल बिखेर कर
खेलूँगा भक्ति की होली में
तुम जैसे होंगे अनगिनत
मुझ जैसे है आज भी
कुछ छोटी बड़ी टोली में ।6।