
पहले जैसे मासूमियत
वो समर्पण
अब नहीं है मुझमें
दाँत से काँट
गोली बाँट
खाया था हमने
अब समझदारी
का रोग लगा है
वो निःस्वार्थ हिस्सा
अब झूठा लगता है मुझे ।।1।।
अब आधा नहीं
पूरा हिस्सा
चाहिये जमीन का
बैठ कभी खाये थे संग
वो भाई की थाली
अब झूठी लगती है मुझे ।।2।।
न हदें न सरहदें
रिश्तों के बीच
न कोई लकीर थी
न पहले जैसे प्यार
वो विश्वास
अब, नहीं है मुझमें
दिलों में गाँठ
दिलों में फाँस
अब है अधिक
जब से रोग लग है
हर निश्छल प्रेम
अब झूठा लगता है मुझे
बंधन का रोक टोक
आकरण लगता है मुझे ।।3।।

बे वजह बात बढ़ जाती है

तेरी पुरानी खत पढ़, तुझे समझने की कोशिश करता हूँ
राम …

दिनकर की मद्धम किरणें