जब आप घर छोड़ते हैं तो क्या उसे पूरी तरह छोड़ पाते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं होता कि जिस घर को आप ऊपरी तौर पर छोड़ते हैं उसका बड़ा हिस्सा आपके भीतर मौजूद रहता है और वक्त आने पर वही बड़ा हिस्सा आपको अपने भीतर समेट लेता है और आखिर में आप उसी (घर) के हिस्से हो जाते हैं जिसे आप पहले छोड़ चुके होते हैं? त्रिपुरारी शर्मा का नाटक `संपदा’ इसी बात को कहता है। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के दूसरे साल के साथ किए नए नाटक `संपदा’ में एक रूपक के पेश कर बनाकर त्रिपुरारी शर्मा ने घर से विद्रोह और फिर उसी घर मे वापसी की नियति को प्रस्तुत किया है। संपदा एक स्तर पर पारिवारिक संस्कार और विद्रोही तेवर के बीच विडंबनात्मक तेवर को पेश करता है।
नाटक का मुख्य किरदार, जो दरअसल एक युवक है, अपने पिता और घर से विद्रोह कर एक काल्पनिक जगह…
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